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बच्चों के हाथ में तकली

udaybhoomi 20/4/2017/span> Technology

 रजनीकांत वशिष्ठ : आज से चार दशक पहले उत्तरप्रदेश के प्राइमरी स्कूलों में कक्षा तीन से पांच तक की पढ़ाई के दौरान एक पीरियड ऐसा हुआ करता था जिसमें विषय के रूप में बच्चों को तकली के बारे में बताया जाता था। इस तकली से बच्चों को रुई से सूत बनाने की कला सिखाई जाती थी और इस कते सूत की गुणवत्ता के आधार पर बाकायदा नंबर दिये जाते थे। इसे यूं समझ लीजिये कि आजादी के पहले बापू का वो चरखा जिसने बरतानिया हुकूमत में मैनचेस्टर के कपड़ा कारोबार की चूलें हिला डाली थीं, इसी तकली का परिष्कृत रूप हुआ करता था।


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आज की ताजा पीढ़ी के स्कूली बच्चों को पता ही नहीं होगा कि यह तकली क्या होती है। पर सत्तर के दशक में आजादी मिले ज्यादा वक्त नहीं हुआ था। आजादी से पहले मैनचेस्टर की कपड़ा मिलों में मशीनों से बने कपड़े के मुकाबिल हाथ से कते सूत के बने कपड़ों को अपनाने के लिये ही बापू ने चरखे को अपना हथियार बनाया था। देश को कपड़े के मामले में स्वाबलम्बी बनाने के बापू के इसी आंदोलन को धार देने के इरादे से स्कूलों में तब बच्चों में तकली के माध्यम से ये संस्कार पिरोने के लिये ही तब सूत कातना एक विषय हुआ करता था। उसी दौरान उत्तरप्रदेश के ब्रज क्षेत्र में एक लोकगीत रेडियो पर बड़ा लोकप्रिय हुआ करता था-चरखा लाय दे रे मोरे भरतार, सूत कातूं नहनो नहनो। कताई का यह विषय उन बच्चों के लिये वरदान साबित होता था जो किन्हीं कारणों से बहुत आगे तक पढ़ नहीं पाते थे। वो कम से कम इस सीख के सहारे सूत कात कर न केवल अपनी आजीविका कमाने के लायक हो जाते थे। बल्कि देशवासियों के कपड़े की जरूरत को पूरा करने में अपना योगदान दे सकने लायक हो जाया करते थे। उत्तरप्रदेश में तब निजी स्कूलों की संख्या बहुत कम होती थी। पर बाद में अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूलों की तादाद जैसे जैसे बढ़ी और सरकारी प्रायमरी स्कूलों की हालत दयनीय हुई तो धीरे धीरे यह विषय पाठ्यक्रम से गायब होता चला गया। आमजन के बीच अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा के प्रति बढ़ते आकर्षण ने बच्चों को रोबोट की तरह किताबी कीड़ा बनाना शुरू कर दिया।

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उसी दौर में प्रायमरी शिक्षा के बाद सरकारी हाई स्कूल और इंटरमीडियेट काॅलेजों में एक और विषय पीवीटीसी हुआ करता था।

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पीवीटीसी माने प्राॅविंशियल वोकेशनल ट्रेनिंग संेटर। इस विषय में छात्रों को काष्ठ कला, धातु कला की व्यावसायिक शिक्षा दी जाया करती थी। इसमें लकड़ी और लोहे को तराश कर विविध उत्पाद बनाना सिखाया जाता था। इंटर तक पीवीटीसी मे पढ़ कर ही बच्चे उच्चा शिक्षा के लिये पाॅलिटेक्निक स्कूलो का रुख करते थे। यह रोजगारपरक शिक्षा थी जिसे हासिल करने के बाद छात्र सरकारी कार्यालयों में बाबूगिरी की नौकरी के बजाय अपना काम धंधा शुरू कर सकते थे। पर बाद के सालों में प्रायमरी से लेकर इंटर तक न जाने क्यूं इस उपयोगी विषय को तिलांजलि दे दी गयी।

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पर इधर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के हथकरघा और वस्त्रोद्योग मंत्री सत्यदेव पचैरी ने अचानक स्कूलों में हथकरघा बुनकर कला प्रोत्साहन योजना शुरू करने का जो इरादा जाहिर किया तो फिर से तकली और पीवीटीसी की याद आ गई। अब योगी सरकार ने फिर से सरकारी विद्यालयों में ऐसे विषयों को लागू करने का खाका खींचा है उसके मुताबिक इस योजना से इस क्षेत्र में बुनकरों की नई पौध तैयार की जा सकती है। इससे हथकरघा क्षेत्र में बुनकरों की कमी भी दूर की जा सकती है।

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इस योजना के तहत सरकारी माध्यमिक विद्यालयों में नौंवीं से लेकर बारहवीं तक की कक्षाओं मंे कताई बुनाई के कोर्स में नामांकित छात्रों को प्रोत्साहनस्वरूप छात्रवृत्ति दी जाएगी। कक्षा नौ व दस के विद्यार्थियों को 1500 रुपये और कक्षा ग्यारह वा बारह के विद्यार्थियों को 2000 रुपये प्रतिमाह छात्रवृत्ति देने का इरादा है। छात्रवृत्ति की राशि सीधे छात्रों के बैंक खातों में भेजी जायेगी। इस योजना को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हरी झंडी दिखा दी है। प्रदेश के विद्यालयों में अगर यह योजना सुचारु रूप से लागू हो गयी तो इसके सुखद परिणाम सामने आ सकते हैं।

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यह योजना जीवन की तीन मूलभूत आवश्यकताओं-रोटी कपड़ा और मकान में से एक कपड़ा की जरूरत को पूरा करने वाली साबित हो सकती है। आज वैसे ही बाजार में विदेशी ब्रांडों के रेडीमेड कपड़ों की भरमार से प्रदेश के बुनकरों की हालत खस्ता है। उस पर बिजली का संकट, सूत का संकट फिर विपणन का संकट। भला हो मोदी की गुहार का कि हर देशवासी कम से कम एक खादी रूमाल तो खरीदे ही जिसने कुछ हद तक खादी और उससे जुड़े देश भर के बुनकरों को जीने की नयी आस जगायी है।

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अब योगी सरकार के ताजा फैसले से बुनकर उद्योग को और जान मिल सकती है। देश का करोड़ों रुपया जो विदेशी ब्रांड के कपड़ों के माध्यम से विदेशों में चला जाता है वो इस मुहिम से देश के ही कारीगरों के घरों को रोशन करने का काम कर सकता है।

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