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भाजपा बनाम शेष

udaybhoomi 15/5/2018/span> Technology

रजनीकांत वशिष्ठ : भारत की राजनीति में आज भाजपा बनाम शेष विपक्ष का दौर है-यानी गैर भाजपावाद। जैसे आजादी के बीस साल बाद गैर कांग्रेसवाद शुरू हुआ था। लोकतंत्र की यही खूबसूरती है। दुनिया में जहां कहीं भी लोकतंत्र है वहां का लोक गहन मंथन के बाद पक्ष और विपक्ष दोनों को गढ़ लेता है। किसी एक के सिर पर ताज रख देता है तो उस पर अंकुश के लिये किसी दूसरे के हाथ में भाला भी पकड़ा देता है।
,   देश में आजादी के बीस साल बाद यह सिलसिला 1967 में तब शुरू हुआ था, जब आजादी की खुशी की खुमारी काफूर होने लगी थी और बरगद के वृक्ष सरीखे कांग्रेस के नेता जवाहरलाल नेहरू के पौरुख थकने लगे थे। गांव गांव में गांधी टोपी लगाये कांग्रेसी कैडर की पीढ़ी भी बदल रही थी। भारतीय राजनीति में तब ऐसा पहली बार हुआ था कि महासागर जैसी कांग्रेस को 67 के लोकसभा चुनाव के बाद कई राज्यों में छोटी छोटी विपक्षी पार्टियों ने संविद सरकारें बना कर सत्ता से बेदखल कर दिया था।
,   ऐसी ही नौबत 1977 में आयी जब जनता से मिली ताकत के दम पर गैर कांग्रेसवाद के नाम पर सारी विपक्षी पार्टियों ने आपस में विलय करके जनता पार्टी खड़ी कर दी। वो दौर नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी के प्रादुर्भाव और अवसान का था। इसके बाद इंदिरा के बेटे राजीव गांधी के काल में कांग्रेस से उकताई जनता ने दक्षिणमार्गियों, मध्यमार्गियों, वाममार्गियांे को गड्ड मड्ड करके रामो वामो को 1989 के चुनाव के बाद राजदंड थमा दिया।
,  यह सच है कि विपक्षी राजनीति के ये प्रयोग ज्यादा चल नहीं पाये मगर राजनीति में हुई इस उथल पुथल का एक चमत्कारिक लाभ ये हुआ कि जनता ने अपनी सेहत के लिये वैकल्पिक धारा बनाये रखने का हुनर सीख लिया। यही नहीं कांग्रेस का विकल्प बन सकने के योग्य मान कर देश की जनता ने भारतीय जनता पार्टी पर भरोसा जताना शुरू कर दिया। जनता पार्टी और रामो वामो में शामिल बाकी समाजवादी, साम्यवादी पार्टियां विचारों पर आधारित नहीं महज व्यक्ति आधारित पार्टियां बन कर रह गयीं। वस्तुतः व्यक्तिवाद का यही रोग कांग्रेस को लगा है कि किसी एक वंश का वारिस ही राज करने का परमिट उपर से लेकर आया है।
,   कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का विदेश में जाकर राजनीति में वंशवाद के बारे में ये कहना एक हद तक सही भी है कि भारत में ऐसे ही होता आया है। कुछ हद तक साम्यवादी दलों को इस बारे में अपवाद मान लें तो आज फिर कांग्रेस ही क्यों, जहां भी है मुलायम के बेटे, लालू के बेटे, बादल के बेटे, बीजू के बेटे, सिंधिया के बेटे, देवेगौड़ा के बेटे, कल्याण, राजनाथ, जसवंत, शेखावत या सिंधिया के बेटे, बेटियों की चर्चा है। यानी भाजपा भी वंशवाद के मोह से मुक्त नहीं है।
,   पर भाजपा और शेष राजनीतिक दलों में बुनियादी फर्क ये है कि जहां भाजपा के पास आरएसएस के रूप में एक गुरुत्व केन्द्र है वहां गुरुत्व केन्द्र एक व्यक्ति है। विज्ञान कहता है कि कोई वस्तु तभी तक टिकी रहती है जब तक उसे कोई ताकत अपनी ओर खींचे रहे। यही राजनीति पर भी लागू होता है। भाजपा को भी आरएसएस जमीन पर टिकाये हुए है। एक ऐसा विशाल संगठन जिसके गांव गांव में फैले कार्यकर्ता ही आज भाजपा का कैडर हैं जिसका मुखिया कोई व्यक्ति नहीं एक विचार है। चेहरे बदलते रहे विचार नहीं। जहां तक आरएसएस की राजनीतिक शाखा भाजपा का प्रश्न है कल चेहरा अटल का था आज मोदी का है। सामाजिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक क्षेत्र में सरकार की मदद के बगैर किये गये कार्यों ने ही धीरे धीरे देश के लोगों के दिल में आरएसएस की जगह बनायी है।
,   यही वजह है कि 1996 से पहले तक जो दल कांग्रेस को हटाने के नाम पर एक हुआ करते थे वा ेअब भाजपा को रोकने के नाम पर एक होना चाहते हैं। भाजपा को रोकने के नाम पर ही देश में देवेगौड़ा और गुजराल की सरकारें बन गयीं। भाजपा का ग्राफ आज तेजी से उपर चढ़ रहा है। कांग्रेस आज केंचुल बदल रही है, नया उत्तराधिकारी राहुल गांधी आ चुका है। उसे अब सोनिया कांग्रेस से राहुल कांग्रेस में बदला जाना है। गुजरात और फिर कर्नाटक चुनावों ने राहुल गांधी को बोलना सिखा दिया है। अब उन्हें भाजपा की गलतियों का इंतजार रहता है। सेवा दल के नाम से कांग्रेस का एक हाथ लुुज पुंज पड़ा है। मतलब भाजपा के हमलों से बेजार छोटे दल ये समझ रहे हैं कि कांग्रेस अभी पुननिर्माण के दौर से गुजर रही है। या यूं कहें कि उन्हें अभी लग रहा है कि कांगे्रस के पास गैर भाजपा के नाम पर शेष दलों की धुरी बनने की ताकत नहीं है। वरना फिलहाल तो वो मोदी के शब्दों में पंजाब, पुडुचेरी और परिवार यानी पीपीपी पार्टी बन कर रह गयी है।
,   2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए देश मंे एक बार फिर से मोर्चा बना कर भाजपा को घेरने की कोशिशेें शुरू हो गयीं हैं। उत्तर भारत में राहुल और अखिलेश का साथ आना, तेजस्वी यादव का जुड़नाए फिर मायावती और अजित का भी मिल जाना एक संकेत है। इस बात का कि ाइस बार भाजपा को वोटों के बंटवारे का फायदा मिलने से रहा। भाजपा को उत्तर भारत के हिंदी भाषी राज्यों खासकर यूपी बिहार में 14 जैसी विजय बरकरार रखने के लिये एड़ी चोटी का जोर लगाना होगा। दूसरा एक अलग संकेत दक्षिण भारत से उभरा है जिसमें तेलंगाना के के चन्द्र्रशेखर राव धुरी बने हैं। वो ममता बनर्जी, चन्द्रबाबू नायडू, बीजू पटनायक, चैटाला को लेकर अलग खिचड़ी बनाने की मुहिम में जुटे हैं। पर बात वहीं पर आकर अटकेगी कि मिला जुला खेला दो साल से ज्यादा कभी नहीं कामयाब रहा। वजह ये कि कम्युनिस्टों कोे छोड़ कर किसी के पास कैडर नहीं है। कैडर के नाम पर जाति, सम्प्रदाय आधारित टोलियां हैं और कम्युनिस्टों का कैडर भी अकर्मण्य तो हो ही चला है किंकर्तव्यविमूढ़ भी है।
,   ये सब मिल कर अगले साल तक चुनावी जंग में भाजपा के रथ को कितना रोक पायेंगे ये तो आने वाला समय ही बता पायेगा। पर जनता यह भी देख रही है कि कांग्रेस के खिलाफ विकल्पहीनता की स्थिति में क्षेत्रीय दलों के नेताओं ने क्या गुल खिलाये हैं और उनमें से कितने आज जेल की हवा खा रहे हैं। यह सही है कि 2014 में जनता से जो वायदे किये गये थे उनमें से कुछ पर मोदी सरकार अमल नहीं कर पायी है। पर जिस तरह से उसने गरीबों को केन्द्र में रख कर काम किया है, किसानों की बेहतरी की दिशा में गंभीरता दिखायी है, स्वरोजगार को प्रोत्साहन दिया है। गरीब की सेहत के लिये साहसी कदम उठाया है। विदेशों में भारत की रेटिंग को सुधारा है। आपसी संबंधों का संतुलन सही तरीके से साधने का प्रयास किया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के नतीजे सामने आये हैं। भ्रष्टाचार की गंगा उपर से नीचे बहती है। आज शीर्ष पर कोई दाग नहीं है, ईमानदारी झलकती है। बेशक मोदी राज में नीचे अभी ये लत गयी नहीं है। पर लोग ये समझते हैं कि देश को सही राह पर चलाने के लिये पांच साल का समय कम होता है।
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