Latest News

कितनी सुरक्षित रहेगी स्टालिन की नई पारी

udaybhoomi 6/9/2018/span> Technology

विकल्प शर्मा : नयी दिल्ली : मरीना समुद्र तट पर मुथुवेल करुणानिधी को दफनाए जाने के ठीक 20 दिन बाद द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) ने पार्टी के दिवंगत पितामह के पसंदीदा पुत्र एम के स्टालिन का उनके उत्तराधिकारी के रूप में राजतिलक कर दिया. चेन्नै में पार्टी के मुख्यालय अन्ना अरिवालयम में पार्टी की जनरल काउंसिल में 28 अगस्त को 65 वर्षीय स्टालिन को पार्टी का नया अध्यक्ष चुन लिया. करुणानिधि के इस तीसरे बेटे ने 1967 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान राजनीति में कदम रखे थे जब वह महज 14 साल के थे और स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे. उस चुनाव में द्रमुक ने कांग्रेस को तमिलनाडू से स्थायी तौर पर बाहर कर दिया था.
,   स्टालिन पार्टी के अपेक्षाकृत कम उम्र के अध्यक्ष हैं, पर पार्टी में अब भी वयोवद्ध लोगों का पूरा तंत्र है. 95 वर्षीय के0 अंबाझगन 1977 से पार्टी के महासचिव बने हुए हैं. अभी तक प्रधान सचिव रहें 70 वर्षीय दुरैमुरूगन को नया कोषाध्यक्ष चुना गया. जाहिर है वर्षो तक पिता की छत्रछाया में काम करने के बाद स्टालिन पार्टी नेतृत्व के साथ कोई छेड़छाड़ करने से बच रहे हैं. वे इन सभी वयोवृद्ध नेताओं के साथ काम करते हुए बड़े हुए हैं. उन्होने अध्यक्ष चुने जाने के बाद पार्टी की प्राथमिकताओं का ऐलान किया. पार्टी अध्यक्ष के तौर पर अपने पहले भाषण में उन्होने द्रमुक के कैडरों से नरेन्द्र मोदी की सरकार को सबक सिखाने और केन्द्र से दक्षिणपंथी सरकार को बेदखल करने का आहवान किया. यह 2019 में विपक्ष के महागठबंधन के लिए उत्साहजनक घोषणा हैं.
,   कई लोगों का मानना है कि स्टालिन का रास्ता उनके पिता के लोकतांत्रिक और आम सहमति वाले तौर-तरीके से अलग होगा. इस साल मार्च में उन्होने जिला स्तर के पदाधिकारियों और द्रमुक के कैडरो से कहा था, ‘‘अगर आप चाहते है कि पार्टी आगे बढ़े तो आपका अब मेरे तानाशाही तौर-तरीकों को स्वीकार करना होगा. पार्टी में अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों को बिलकुल बर्दाश्त नही किया जाएगा.’’पार्टी के सर्वेसर्वा के तौर पर स्टालिन पिता के दिए हुए अपने नाम को सही साबित कर सकते हैं (यहां तक कि उनका और रूस के तानाशाह स्टालिन का जन्मदिन भी एक है). इस बीच स्टालिन के बड़े भाई एम के अलागिरी जिन्हे 2014 में पार्टी से निकाल दिया गया था, दोबारा अपनी जगह बनाना चाहते हैं. उन्होने चेताया है कि नया नेतृत्व (स्टालिन के अधीन) उन्हे पार्टी में लेने से मना करता है तो इसके गंभीर नतीजे होंगे. वही माना जा रहा है कि स्टालिन की सौतेली बहन कनिमोली दिल्ली में उनकी आंख और कान की भूमिका निभाएंगी, ठीक उसी तरह जैसे करुणानिधि के लिए मुरसोलि मारन और उनक बटे दयानिधि मारन निभाते थे.
,   राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि द्रमुक मे स्टालिन के लिए कोई चुनौती नही है पर पार्टी के बाहर उन्हे ऐसे नेता के तौर पर उभरना होगा जो चुनावों में पार्टी को जीत दिला सकता है. करुणानिधि जब अधिक वृद्ध हो चुके थे (खासकार 2011 के बाद से) तो उनकी जगह पर स्टालिन का प्रबंधन अच्छा नही रहा है. उन्होने जब से पार्टी की कमान संभाली थी तब से द्रमुक लगातार दो विधानसभा चुनाव हार चुकी है और 2014 के लोकसभा चुनावों में तो वह एकदम साफ हो गई थी.
,   2019 का लोकसभा चुनाव और विधानसभा के दो आगामी उपचुनाव स्टालिन के लिए अपनी काबिलियत साबित करने का सही मौका होंगे. इसमें उन्हे सही उम्मीदवारों के चयन और गठबंधन बनाने में अपनी योग्यता साबित करनी होगी. तमिनलाडू में करुणानिधि और जयललिता दोनों के निधन के बाद चुनावी समीकरण बदल रहे हैं. 39 लोकसभा सीटों - पांचवा सबसे अधिक सीटों वाला राज्य तमिलनाडू दिल्ली में सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाएगा. विश्लेषकों के मुताबिक, अगर वे सही गठजोड़ और सही उम्मीदवारों को चुनाव करते हैं तो अच्छा मोल-भाव कर सकते हैं.
,   कई लोगों का मानना है कि स्टालिन ऐसा कर सकते हैं. उनकी पहचान मेहनती नेता के तौर पर है और कैडरों में अच्छा सम्मान है. 2016 के विधानसभा चुनावों से पहले उनके ‘नमक्कू नामे’(हमारी ओर से, हमारे लिए) रोड शो ने लोगों को खूब आकर्षित किया था. खासकर पार्टी के इतर युवा मतदाताओं को, लेकिन स्टालिन संवाद के मामले में कमजोर और कैडरों के लिए सहज उपलब्ध नहीं रहें हैं। अब अध्यक्ष बनने के बाद उन्हे अपनी आदत बदलनी होगी और लोगों के लिए उपलब्ध रहना होगा. खुलेपन और पारदर्शिता के मामले में वे अपनी पिता के आसपास भी नही हैं, फिर भी उन्होने खुद को एक समझदार व्यक्ति के तौर पर पेश किया है-कम नरम, लेकिन अडिग. मगर अपने ही भाई अलागिरी से वो कैसे निपटेंगे ये आने वाला समय बताएगा.
,  

Related Post