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दलित एक्ट पर हंगामा है क्यों बरपा ?

udaybhoomi 27/9/2018/span> Technology

सतीश चन्द्र मिश्र : लखनऊ : "ये कानून जो दलित और आदिवासियों के संरक्षण का कानून है, उनके स्वाभिमान की लड़ाई का कानून है. इस कानून में किसी प्रकार का डाइल्यूशन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को मंजूर नहीं. सरकार को अपनी गलती, जो जानबूझकर उन्होंने की एक षड़यंत्र के तहत मोदी सरकार ने, कम से कम उसे अब सुधार लें वरना जब इस देश का गरीब उठेगा तो देश का सिंहासन हिलेगा और फिर मोदी जी सत्तासीन नहीं रह पाएंगे. जरूरत पड़े तो संसद में संशोधन लेकर आएं. जरूरत पड़े तो दोबारा सुप्रीमकोर्ट में रिव्यू एप्लिकेशन फाइल करें. परन्तु दलितों के अधिकार को कमजोर करने का मोदी सरकार का षड़यंत्र हमें कदापि मंजूर नहीं."
,   सुप्रीमकोर्ट के फैसले के तत्काल बाद संसद भवन के गलियारे में मीडिया के समक्ष उपरोक्त प्रतिक्रिया कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने दी थी. यह प्रतिक्रिया देते समय रणदीप सुरजेवाला के साथ सोनिया गांधी के सर्वाधिक विश्वस्त और निकट समझे जानेवाले कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अहमद पटेल, राज्यसभा में कांग्रेस संसदीय दल के उपनेता आनन्द शर्मा तथा लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के उपनेता ज्योतिरादित्य सिंधिया एवं कुमारी शैलजा सरीखे कांग्रेसी दिग्गज भी उपस्थित थे. इन सभी दिग्गजों ने सुप्रीमकोर्ट के फैसले पर एक स्वर से लगभग ऐसी ही प्रतिक्रिया दी थी.
,   लेकिन मोदी सरकार द्वारा संसद के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के फैसले में किए गए संशोधन के साथ ही कांग्रेसी खेमे ने किस तरह रंग बदलना प्रारम्भ किया उसका प्रमाण है यह ट्वीट...
,  दलितों के वोट पाने के लिये, क्या तुम ब्राह्मण, वैश्य और राजपूतों के “अस्तित्व”और“अस्मिता”को मिटा दोगे.
,  6 सितम्बर को यह ट्वीट साधू वेषधारी प्रमोद कृष्णम नाम के कांग्रेसी राजनेता द्वारा उस समय किया गया गया जब तथाकथित सवर्णों के कुछ छद्म संगठन SC/ST ऐक्ट में संशोधन के खिलाफ भारत बंद का उग्र आयोजन/प्रदर्शन सड़कों पर कर रहे थे. उसी दिन प्रमोद कृष्णम ने दूसरा ट्वीट करते हुए यह लिखा था कि... "जाति और धर्म के नाम पर सड़कों पे“तांडव”और खंड खंड होता समाज,क्या यही 21 वीं“सदी”के भारत का वो स्वप्न है, जो आपने 2014 में दिखाया था।"
,  प्रमोद कृष्णम के उपरोक्त दोनों ट्वीट ऐसा सन्देश देने का प्रयास कर रहे थे कि SC/STऐक्ट में सरकार द्वारा किया गया संशोधन सरासर गलत है.
,   यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि प्रमोद कृष्णम को कांग्रेसी साधू इसलिए लिखा गया है क्योंकि कुछ वर्षों पूर्व तक वह कांग्रेस का सक्रिय राजनेता रहा और उसकी गणना उत्तरप्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ पदाधिकारियों में की जाती थी. 2014 के लोकसभा चुनाव में वह उत्तरप्रदेश की सम्भल लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा था और उसकी जमानत जब्त हो गयी थी. इन दिनों भी प्रमोद कृष्णम को नियमित रूप से न्यूजचैनलों पर राहुल गांधी, कांग्रेस के पक्ष और समर्थन में जमकर बहस करते हुए देखा जाता है.
,   अतः SC/ST ऐक्ट पर देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस क्या और कैसा खतरनाक दोमुंहा जातीय खेल खेलने की कोशिश कर रही है.? इसको रणदीप सुरजेवाला और प्रमोद कृष्णम की टिप्पणियों से समझा जा सकता है।
,   आज कल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय को संसद द्वारा, SC/STएक्ट में संशोधन करके, 1989 में राजीव गांधी की कांग्रेसी सरकार द्वारा बनाये एक्ट को पूर्ववर्ती स्थिति में बहाल किया जाना एक बड़ा सियासी मुद्दा बन गया है. इस संशोधन पर लोगो की कड़ी प्रतिक्रियाये देखी जा रही हैं. यह प्रतिक्रियाये जहां एक तरफ मोदी की सरकार के विरुद्ध सवर्ण वर्ग से आ रही है वही दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी, जिसकी सरकार ने 1989 में यह एक्ट बनाया था, वो इस विरोध को भरपूर समर्थन दे रही है. लेकिन दलित हितों की सबसे बड़ी ठेकेदार चौकीदार होने का पाखण्ड कर रही और आज जातीय भावनाओं की आग भड़का कर उस आग में अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की कोशिश कर रही कांग्रेस का चेहरा और हाथ बहुत काले नज़र आते हैं इस कहानी में।
,   वर्ष 2016 में देश में IPC तथा SLLकी धाराओं के तहत देश मे दर्ज हुई आपराधिक घटनाओं की संख्या 48 लाख 31 हज़ार 515 थी. वर्ष 2015 में यह संख्या 47 लाख 10 हज़ार 676 थी तथा वर्ष 2014 में यह संख्या 45 लाख 71 हज़ार 663 थी. जबकि वर्ष 2016 में दलितों के खिलाफ अत्याचार की आपराधिक घटनाओं की संख्या 40 हज़ार 801 थी यानि कुल दर्ज आपराधिक घटनाओं का लगभग 00.85%. 2015 में में दलितों के खिलाफ अत्याचार की आपराधिक घटनाओं की संख्या 38 हज़ार 670 थी. यानि कुल दर्ज आपराधिक घटनाओं का लगभग 00.82%. 2014 में में दलितों के खिलाफ अत्याचार की आपराधिक घटनाओं की संख्या 47 हज़ार 64 यानि कुल दर्ज आपराधिक घटनाओं का लगभग 01.04%.
,   यहां उल्लेख अत्यन्त आवश्यक है कि NCRB के दस्तावेज यह बताते हैं कि दलितों के खिलाफ अत्याचार की कुल दर्ज आपराधिक घटनाओं में हत्या सरीखे जघन्य अपराध की संख्या का प्रतिशत डेढ़ से दो के बीच है तथा बलात्कार सरीखे घृणित अपराध की संख्या का प्रतिशत 5 से 6 के बीच है. यह प्रतिशत पिछले कई वर्षों से है. बल्कि पिछले कई वर्षों से यह लगभग स्थिर ही है. उपरोक्त आंकड़ें SC/ST एक्ट में संशोधन के विरोध और समर्थन में हंगामा हुड़दंग कर रहे दोनों पक्षों को कठघरे में खड़ा करते हैं. यह आंकड़े न्यूजचैनलों, राजनेताओं और उन तथाकथित बुद्धिजीवियों, दलित चिंतकों को भी पूरी तरह बेनकाब करते हैं जो देश में ऐसा हंगामा कर रहे हैं मानो देश में दलितों पर अत्याचार की बाढ़ आ गयी हो.
,   पहले बात उन लोगों की जो पिछले कुछ दिनों से दलित ऐक्ट में संशोधन के खिलाफ प्रचण्ड मातम कर रहे हैं. उन्हें क्या यह ज्ञात नहीं या वो जानबूझकर अनजान बनने का ढोंग कर रहे हैं कि देश में दर्ज होनेवाली 40-45 लाख आपराधिक घटनाओं में जिन धाराओं के तहत गिरफ्तारी होती है उनमें से बहुत बड़ी संख्या ऐसी धाराओं की है जो गैर जमानती होती हैं. अतः SC/STएक्ट को गैर जमानती बनाने पर ऐसा हंगामा क्यों मानो आसमान टूट पड़ा हो या धरती फट गयी हो. सवाल उन न्यूजचैनलों, राजनेताओं, तथाकथित बुद्धिजीवियों, दलित चिंतकों से भी जो दलितों पर अत्याचार की घटनाओं का डंका इस तरह पीट रहे हैं मानो देश में चारों तरफ आग लगी हो और उस आग में केवल दलितों को जलाया जा रहा है.
,   देश में प्रतिवर्ष औसतन 37-38 हज़ार हत्याएं तथा लगभग 32-35 हज़ार बलात्कार सरीखे जघन्य अपराधों की घटनाओं समेत 40-45 लाख आपराधिक घटनाएं होती हैं. उनका शिकार बनने वाले लोगों की हत्या क्या जाति देखकर पूछकर की जाती है ? सच यह है कि जिस देश में प्रतिवर्ष 40-45 लाख आपराधिक घटनाएं प्रतिवर्ष होती हों, तो उस देश में रहने वाला कोई भी वर्ग कोई भी समुदाय उन घटनाओं की चपेट में आने से कैसे बच सकता है.? सच तो यह है कि सरकारों की सजगता और SC/ST सरीखे कानूनों के चलते देश में दलितों के खिलाफ होने वाले अत्याचार की आपराधिक घटनाओं का प्रतिशत देश में होनेवाली कुल आपराधिक घटनाओं की तुलना में बहुत कम है. इसके अलावा NCRB के ही आंकड़ें यह सच भी बताते हैं कि 2016 में पुलिस जांच में अनुसूचित जाति को प्रताड़ित किये जाने के 5347 केस झूठे पाए गए जबकि अनुसूचित जनजाति के कुल 912 मामले झूठे पाए गए.
,   वर्ष 2015 में एससी-एसटी कानून के तहत अदालत ने कुल 15638 मुकदमे निपटाए जिसमें से 11024 केस में अभियुक्त बरी हुए या आरोपमुक्त हुए (अर्थात इतने मामले फ़र्ज़ी निकले) जबकि 495 मुकदमे वापस ले लिए गए. सिर्फ 4119 मामलों में ही अभियुक्तों को सजा हुई. ये आंकड़े 2016-17 की सामाजिक न्याय विभाग की वार्षिक रिपोर्ट में दिए गए हैं.
,  लेकिन उपरोक्त दुरुपयोग और विसंगतियों पर रोक के सुप्रीमकोर्ट के फैसले के ख़िलाफ़ कांग्रेस ने बसपा के साथ मिलकर सड़कों पर किस तरह से हिंसा का खूनी ताण्डव शुरू किया था, देश यह भूला नहीं है. सुप्रीमकोर्ट के उस फैसले के का प्रचण्ड विरोध करते हुए, सुप्रीमकोर्ट के उस फैसले को बदलने का जबरदस्त दबाव बनाने के लिए कांग्रेस ने देश की संसद को अपने हंगामे से ठप्प कर के चलने नहीं दिया था. सुप्रीमकोर्ट के फैसले को अपने राजनीतिक दुष्प्रचार का घातक हथियार बनाकर कांग्रेस ने आर्थिक सामाजिक शैक्षिक रूप से सर्वाधिक पिछड़ी हुई देश की लगभग 25% जनसंख्या में इस भ्रम का ज़हर बांटना प्रारम्भ किया था कि सरकार ने SC/ST ऐक्ट ही खत्म कर दिया है.
,   सरासर झूठे इस जहरीले राजनीतिक दुष्प्रचार की कमान कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने स्वयं सम्भाल ली थी. अपनी अनेक जनसभाओं में राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से सरकार पर यह आरोप लगाए थे कि वो SC/ST ऐक्ट को खत्म कर रही है. देश पर लगभग 55 वर्ष तक राज करती रही देश की सबसे पुरानी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा यदि जनता से इसतरह का झूठ बोला जाए तो उसका दुष्परिणाम कितना घातक होता है यह इसी वर्ष अप्रैल में देश ने देखा भी और भोगा भी. दर्जनों शहरों में जातीय दंगे हुए. हज़ारों करोड़ की सम्पत्ति जलाकर राख कर दी गयी और इन दंगों में 15 लोगों की मौत हो गयी. अतः ऐसी विषम विषाक्त परिस्थिति का सामना और तत्काल समाप्ति करने के लिए सरकार ने सुप्रीमकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने का जो निर्णय किया उसपर बहस हो सकती है किन्तु उस फैसले को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता.
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