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ऐसे होगा वंचितों का कायाकल्प

udaybhoomi 27/9/2018/span> Technology

विकल्प शर्मा : नयी दिल्ली : वंचित तबके के लिए चलने वाले ज्यादातर सामाजिक आन्दोलन कुछ स्वीकार्यता हासिल करने के बाद चुनावी रास्ते पर चल पड़ते हैं. वैसे तो यह बदलाव सत्ता और न्याय हासिल करने के लिए होता है लेकिन दलगत राजनीति उनके आन्दोलन से सामाजिक झुकाव को समाप्त कर देती है.
चन्द्रशेखर आजाद की भीम आर्मी इसी तरह के चौराहे पर खड़ी है जहाँ उसे यह तय करना है कि अब चुनावी छलाँग लगाये या सामाजिक आन्दोलन के रूप में आगे चलते रहें. आजाद के सामने मायावती और बसपा जैसी मजबूत प्रतिद्वंदी हैं. आज आजाद जो कह रहे हैं उसी तरह से मायावती ने 1980 के दशक में मनुवाद के खिलाफ अपने आग उगलने वाले भाषणों से सवर्ण हिन्दुओं की ज्यादतियों का मसला उठाया था लेकिन आजाद मायावती का इस सवर्ण राजनीति की आलोचना करते रहे हैं और वे चाहते हैं कि फिर से बहुजन पर ध्यान केन्द्रित किया जाए. हालाँकि वे इस बात को जानते हैं कि भारत के हाशिये के लोगों में मायावती का क्या स्थान है और यह भी जानते हैं कि अभी राजनीतिक छलाँग लगाने का समय नहीं आया है इसलिए उन्हें सार्वजनिक तौर पर मायावती से टकराव से बचना होगा.
राजनैतिक विश्लेषण और विरोधी मायावती को खारिज कर सकते हैं लेकिन उनकी बसपा अभी भी एक राष्ट्रीय पहचान बनाये हुए है. अम्बेडकर वादी जमात के भीतर से मिलने वाली चुनौती उनके लिए कोई नई बात नहीं है लेकिन वे भीतर से मिलने वाली चुनौती पर विजय पाती रही हैं और उन्होंने अपनी पार्टी राष्ट्रीय अम्बेड़कर वादी राजनीति में एक अद्भुत और प्रभावी ताकत बनाये रखा है. हालाँकि इस विचार को खारिज नहीं किया जा सकता है कि मायावती और नई पीढ़ी के अम्बेड़करवादी नेताओं के बीच एक तरह की दूरी है.
सच तो यह है कि मायावती जब उत्साह के साथ लखनऊ में 2019 के लोकसभा चुनाव अभियान की शुरूआत करने जा रही थी उसके एक दिन पहले ही 14 सितम्बर को आजाद की रिहाई उनके प्रबल समर्थकों और कार्यकर्ताओं को भ्रमित करने की एक रणनीति हो सकती है. आजाद की रिहाई से कांग्रेस को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित मुस्लिम गठजोड़ के जरिए फिर से जगह बनाने में मदद मिल सकती है. प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष ईमरान मसूद आजाद के साथ लगातार सम्पर्क में रहे और आजाद ने जेल से रिहा होने के बाद उनके सहयोग के लिए आभार भी जताया था.
बसपा की राजनैतिक विरोधी भाजपा और कांग्रेस दोनों जिग्नेश मेवानी और आजाद सरीखे नये नेताओं को अपने लिए अवसर के रूप में देख रही हैं. कई आलोचक तो मेवाणी को अगला काशीराम बताते हैं. आजाद ने जहाँ अम्बेड़करवादी से जगह बनाई है वही मेवाणी पैराशूट से उतरे एक नेता है मेवाणी ने तो अपनी एक राजनीतिक पार्टी अम्बेड़कर कांशीराम और मायावती जैसे नेताओं के पहचान की राजनीति की आलोचना के साथ शुरू की थी.
दिसम्बर 2017 के गुजरात विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को यह उम्मीद रही होगी कि जिग्नेश मेवाणी का समर्थन कर वह बसपा के थोड़े बहुत असर से बेअसर कर देंगी लेकिन बाद मे उसे लगा होगा किए बसपा के साथ गठजोड़ करने से ज्यादा फायदा नहीं होगा या हमारी राष्ट्रीय राजनीति के इस मोड़ पर जब विपक्षी दल भाजपा के प्रभुत्व से मुकाबले के लिए एक ठोस रणनीति की तलाश के लिए जूझ रहे हैं. मायावती भी अपना आधार बढ़ाने के लिए अवसर की तलाश में हैं.
मायावती अपने राजनीतिक गुरू की असल रणनीति पर चलते हुए एक मजबूर सरकार चाहती है जिससे वंजित तबकों को ज्यादा मोल तोल का अवसर मिल सके. दूसरी तरफ भाजपा भी वंचित जातियों को लुभाने की कोशिश कर रही है जो एक समावेशी सत्य धर्म है जिसमें सबका साथ सबका विकास ;मुसलमानों को छोड़कर होता है. कांग्रेस भी हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद पर अपना दावा जता रही है.
शब्दाडंबरों को परे रख दें तो अभी तक भाजपा के कथित समावेशी हिन्दुत्व में तो भाजपा शासित कई राज्यों में दलितों के प्रति हिंसा में बढ़ोत्तरी देखी जा रही है. दलितों को सहारा देने के लिए लाये गये अत्याचार निवारण एक्ट जैसे कानूनों की जरूरतों पर भी सवाल किये जा रहे हैं. दूसरी तरफ मायावती मन्दिर मन्दिर दर्शन के लिए जाने में अपना समय बर्बाद करने वाली नहीं है वे प्रभावी तरीके से बसपा की राष्ट्रीय मौजूदगी का फायदा उठाते हुए मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस के साथ जबरदस्त मोल तोल में लगी हुई है.
दलितों और अन्य वंचित तबकों को अपने लिए वोट करने पर आवाहन कर बसपा उस दस्तूर को खत्म करने की लगातार कोशिश कर रही है जिसमें वंचित तबका ऊँची जातियों के लिए वोट करता रहा है. मायावती ने ऐसी परिस्थितियों का भी निर्माण किया है जिसमें ऊँची जातियों के लोग नीचे आकर बसपा के लिए वोट करते हैं.
बसपा की राष्ट्रीय उपस्थिति और प्रासंगिकता काफी हद तक इस तथ्य पर निर्भर है कि उत्तर भारत में अम्बेड़करवादी दलगत राजनीति में बिखराव नहीं है वैसे तो कई सामाजिक आन्दोलन है लेकिन बसपा अम्बेड़करवादियों की सबसे महत्वपूर्ण आवाज बनी हुईं है.
लोकतांत्रिक राजनीति में सफलता के लिए संतुलन और व्यवहारिकता के रास्ते पर चलने की जरूरत होती है आजाद इस बात को जानते है और वे खुद को रावण कहलाना भी पसन्द नहीं करते हैं लेकिन उनके लिए मायावती के साथ राजनैतिक टकराव मोल लेना अभी बहुत ज्यादती होगी. उन्हें कुछ समय के लिए सामाजिक क्षेत्र में अपने उग्र बहुजन को ही बनाये रखना होगा.


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