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दलित बेटी का मायावी चेहरा

udaybhoomi 11/10/2018/span> Technology

विकल्प शर्मा : लखनऊ : दलित की बेटी कहलाने वाली मायावती ने सभी को अनुमान लगाने के लिए मजबूर कर दिया है. मई में एच डी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी के साथ गर्मजोशी दिखाई. जुलाई में उन्होंने राहुल गाँधी के खिलाफ अपमानजनक भाषा बोलने वाले एक नेता को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. ऐसे में उन्हें कांग्रेस के प्रति नरम माना जा रहा था. पर १० सितम्बर को उन्होंने पेट्रोल डीजल की बढती कीमतों के भाजपा और कांग्रेस के नेतृत्व वाली पूर्व की दोनों सरकारों को जिम्मेदार ठहराया. फिर २० सितम्बर को उन्होंने छत्तीसगढ़ के आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अजित जोगी की पार्टी से गठबंधन करके कांग्रेस को झटका दिया. और ४ अक्टूबर को कांग्रेस को धोखेबाज़ बताते हुए काशीराम और आंबेडकर का अपमान करने वाला बताया और समझोते और सुलह के सरे रस्ते बंद कर दिए. मायावती यहीं नहीं रुकीं उन्होंने यहाँ तक कह डाला कि कांग्रेस ने पीठ में छुरा घोंपने वाला काम किया है.
,   लिहाजा मोदी के खिलाफ तैयार हो रहे मोर्चे को लगभग छिन्न भिन्न कर दिया. इससे एक बात साफ हो जाती है कि क्या मायावती मोदी से दोस्ताना मैच खेल रहीं हैं. मध्यप्रदेश में कांग्रेस के साथ तालमेल की बात चल रही थी और इसमें कमलनाथ, अहमद पटेल बड़ी भूमोका निभा रहे थे. लेकिन मायावती ने पहले ही संकेत दे दिया था कि २०१९ में उन्हें सम्मानजनक सीटें मिलेंगी तो ही वो आगे बढेंगी. मायावती इस बात पर अदि हुईं थीं कि मध्यप्रदेश में कमलनाथ मुख्यमंत्री का चेहरा बनें. सूत्र बताते हैं कि कमलनाथ और मायावती के बीच बड़ी डील हुई थी. अब मध्यप्रदेश में बसपा सभी २३० सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार रही है जबकि २२ सीट पर पहले ही घोषणा की जा चुकी है.
,   राजस्थान में भी कुछ ऐसा ही प्लान दालित नेत्री का रहा है. २०१४ में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली पर राज्य की ३४ सीटों पर वो दूसरे नंबर पर रही. भाजपा के खिलाफ मोर्चा बनाने के लिए वो कम से कम ५० सीट की मांग कर रहीं हैं. अखिलेश यादव अपनी हैसियत जानते हैं इसलिए वो किसी भी कीमत पर मायावती को छोड़ना नहीं चाहते और कांग्रेस को भी हैसियत बताने की कोशिश कर रहे हैं. तो क्या ये मानना चाहिए कि बबुआ और भतीजे ने कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखा दिया.
,   भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर को जेल से बाहर करने की भाजपा की चाल को तोड़ते हुए मायावती ने चंद्रशेखर की और से दिए गए संकेतों को तुरंत ख़ारिज कर दिया. चंद्रशेखर ने अपने सम्मान, खून और जाती का हवाला देते हुए मायावती को बुआ कह कर संबोधित किया. मायावती ने तुरंत पत्ता फेंका कि मेरी बुआ भतीजे जैसी कोई रिश्तेदारी नहीं है. मायावती अच्छी तरह जानती हैं किसी अन्य दलित नेता के उभरने से सपा से उनकी सौदेबाज़ी की ताकत गिर जाएगी. मायावती का ये फैसला कांग्रेस के लिए एक झटके से कम नहीं है जो भाजपा विरोध के नाम पर विपक्षी दलों को एक साथ लेन की कोशिश कर रही है. बसपा के इस फैसले से अगले आम चुनाव के पहले भाजपा विशेषकर प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ विपक्षी दलों की कोशिश का असर कम दिखने लगा है. विपक्षी दलों का महागठबंधन यदि आकर नहीं ले पा रहा है या विश्वास कायम नहीं रख पा रहा है तो इसके लिए उसके नेता ही जिम्मेदार हैं.
,   विपक्ष जिस गठबंधन की बात कर रहा है उसने न तो आज तक कोई सार्थक एजेंडा सामने रखा कि इस गठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा .सबसे बड़ी समस्या इस गठबंधन का नेतृत्व करने की इच्छा रखने वाले राहुल गाँधी को देखें तो साफ है कि जो अपने दल को कोई नीतिगत नहीं दे प् रहा हो वो सबका नेता कैसे बनेगा. न ही राहुल अब तक जनता के सामने कोई वैकल्पिक विचार पेश कर पाए हैं.
,   बसपा ने मध्यप्रदेश और राजस्थान में अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा करते हुए जिस तरह कांग्रेस नेताओं में अहंकारी होने का आरोप लगाया है उससे विपक्ष का नेतृत्व करने की कांग्रेस की क्षमता पर नए सिरे से सवाल खड़े हो गए हैं. ये ठीक है कि कांग्रेस सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है लेकिन एक के बाद एक राज्यों में उसका जनाधार सिमटता जा रहा है. इससे वो इस स्थिति में नहीं रह गयी है जिससे सभी उसके नेतृत्व को स्वीकार कर लें.
,   जहाँ तक मायावती की बात है तो ये पहली बार नहीं है कि उन्होंने किसी दल के साथ गठबंधन के संकेत दे कर अपने कदम पीछे नहीं खींचे हैं. उनकी राजनीती इसी तरह चलती है. फ़िलहाल ये नहीं कहा जा सकता कि वो अपने मौजूदा रुख पर कायम रहेंगी या नहीं. जो उनके मौजूदा तौर तरीके हैं उन्हें देख कर कहा जा सकता है कि वो कुछ भी कर सकतीं हैं. इन तीन राज्यों के परिणाम आने के बाद कांग्रेस को अपनी रीति और नीति को नए सिरे से संवारना होगा.
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