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क्यों परेशान हैं सत्ता के लोग

udaybhoomi 17/10/2018/span> Technology

विकल्प शर्मा : नयी दिल्ली : एक लम्बे समय बाद ऐसा दिखाई दे रहा है कि जो लोग सत्ता में हैं वे अपनी प्रजा के मुकाबले ज्यादा परेशान हैं. जो हालत इस समय देश में हैं वैसे या तो किसी युद्ध के पहले या फिर आपातकालीन परिस्थितियों में ही आते हैं. पर ऐसा भी हो सकता है कि परिस्थितियां आपातकाल जैसी हों और जनता स्वयं के साथ ही युद्ध लड़ने की तयारी में जुटी हो. जनता को यह महसूस हो रहा है कि राजनितिक दल अब दीर्घकालिक भरोसे के नहीं रहे.
,   दलों ने उसे विश्वास में लिए बगैर ही अपने एजेंडे में रातों रात फेरबदल शुरू कर दिया है. जो सत्ता में काबिज़ हैं या उसके इर्द गिर्द भी बने हुए हैं वे इस समय अपनी रोजी रोटी को लेकर ही देश के कोई तीन करोड़ बेरोजगारों के मुकाबले ज्यादा चिंतित दिखाई दे रहे हैं. ये लोग सत्ता में अपनी वापसी के लिए अब भी कुछ कर सकते हैं. जनता को लगता है कि राजनीती अन्दर ही अन्दर करवटें बदल रही है और बाहर उसकी आहात भी नहीं सुनाई पड़ रही है.
,   अचानक ऐसा कुछ हुआ है कि कांग्रेस ने तो देश के 17करोड़ मुसलमानों की तरफ देखना बंद कर दिया है और दूसरी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने उनके दिलों को टटोलना शुरू कर दिया है. देश में मुसलमानों की संख्या मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ की आबादी से भी ज्यादा है. माना जा सकता है कि अब न तो मुसलमानों को पाकिस्तान जाना होगा और न ही उत्तरप्रदेश में रहने के लिए योगी योगी करना होगा.
,   संघ प्रमुख मोहन भागवत के अनुसार, हम कहते हैं कि हमारा हित राष्ट्र है, इसका मतलब इसमें मुसलमान नहीं होने चाहिए, ऐसा बिलकुल नहीं होगा. जिस दिन ये कहा जायेगा कि यहाँ मुसलमान नहीं होने चाहिए उस दिन हिन्दू नहीं रहेगा. संघ प्रमुख के इस बयान के बाद मुसलमानों को निश्चिन्त हो जाना चाहिए था पर वैसा नहीं हुआ. राहुल गाँधी और कांग्रेस ने भी संघ प्रमुख की टिप्पणी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. अपेक्षित भी नहीं थी.
,   मुसलमान भी देख रहे हैं कि राहुल गाँधी अचानक से कुछ ज्यादा ही हिन्दू हो गए हैं. सोमनाथ और मानसरोवर की यात्राओं के बाद वे भगवान राम के वन गमन मार्ग का सहारा लेकर कांग्रेस का सत्ता से वनवास ख़तम करना चाहते हैं. निश्चित ही भाजपा को राहुल का इस वक्त नरम हिन्दू हो जाना रास नहीं आ रहा है. उसे लगता है कि राहुल उसके हिंदुत्व के किले में अनधिकृत रूप से सेंध लगा रहे हैं.
,   जनता को समझाया जा रहा है कि अब सब कुछ बदल रहा है. किसानों की आत्महत्याओं के मामले चाहे बढ़ रहे हों. मोब लिंचिंग की घटनाएँ चमत्कारिक रूप से बंद हो गयीं हैं. यह भी महसूस कराया जा रहा कि गोकशी या गाय की तस्करी एक हद से बंद हो गयी है क्योंकि अब कोई भी कथित अपराधी गोमांस के साथ गौ सेवकों द्वारा पकड़ा नहीं जा रहा है.
,   जनता भी समझती है कि सब कुछ उससे आँखें चुरा कर पेश किया जा रहा है. ऐसे मुद्दे जिन पर सफाई वास्तव में सरकार की तरफ से आनी चाहिए, संघ प्रमुख की तरफ से आ रही है. एक तरफ तो मोहन भागवत कहते हैं कि राजनीति से संघ का कोई लेना देना नहीं है. तो दूसरी और वे पांच राज्यों में होने जा रहे चुनाव के ठीक पूर्व आश्वस्त करते हैं कि संविधान सम्मत सभी आरक्षण को संघ का समर्थन है.
,   आरक्षण कब तक चलेगा इसका मतलब इसका मतलब जिनके लिए दिया गया है वे ही तय करेंगे. इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए. सबको पता है कि 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव की पूर्व संध्या पर आरक्षण के औचित्य को लेकर की गयी भागवत की टिप्पणी ने किस तरह नतीजों को लालू नितीश के पक्ष में कर दिया था और भाजपा में कैसी नाराज़गी थी.
,   यह बात आइने की तरह साफ हो गयी है और सरकारों के लिए काफी साफ़ हो गयी है कि जनता के दिल से डर गायब हो रहा है. इसे लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत माना जा सकता है.
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