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राम मंदिर ! संदेश या आदेश

udaybhoomi 23/10/2018/span> Technology

विकल्प शर्मा : नयी दिल्ली : नागपुर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्थापना दिवस पर अपने वार्षिक संबोधन में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए जिस तरह कानून बनाने की जरूरत जताई है. उसकी व्याख्या इस रूप में होना स्वाभाविक है कि चुनाव निकट आते ही इस मसले का जानबूझकर उठाया जाना भी कहा जा सकता है. संघ ने मोदी सरकार को सीधा संदेश देने की कोशिश की है. इस संदेश को दबाव के तौर पर भी देखा जा सकता है.
,   जो भी हो मौजूदा माहौल में यह उचित नहीं है कि राम मंदिर के सवाल पर संघ जाने अनजाने मोदी सरकार पर किसी तरह का दबाव बनाते दिखे. निसंदेह कानून के जरिये आयोध्या में राम मंदिर का निर्माण संभव है लेकिन इस राह की अपनी समस्यायें हैं. एक समस्या तो इस सवाल के रूप में आ खड़ी होगी कि अब जब सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की सुनवाई शुरू होने वाली है तब फिर राम मंदिर निर्माण के लिए कोई कानून बन भी जाये तो उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.
,   यह सही है कि अयोध्या विवाद जरूरत से ज्यादा लंबा खिच रहा है और राजनीतिक अडंगेबाजी इस मसले के हल की एक बड़ी बाधा है लेकिन इस सबके बावजूद पुरुषोत्तम राम के नाम का मंदिर मर्यादा के तहत ही निर्मित होना चाहिए. पता नहीं सुप्रीम कोर्ट अयोध्या विवाद का निपटारा कब और किस रूप में करेगा लेकिन इससे अच्छा और कुछ नहीं है. इस भावनात्मक मामले का हल आपसी बातचीत की पहल किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी तो इसका मतलब नहीं है कि आगे भी ऐसा ही होगा. बेहतर होगा कि एक और बार आपसी सहमति से अयोध्या विवाद का हल निकालने की कोशिश हो. यह कोशिश संघ की ओर से भी की जानी चाहिए.
,   संघ प्रमुख ने अपने वार्षिक संबोधन में विभिन्न मसलों पर अपनी राय व्यक्त की जिसमें भारत के विख्यात सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फेसले से असहमति जताई. उनके हिसाब से सुप्रीम कोर्ट को सबरीमाला की उस परपंरा का ध्यान रखना चाहिए था जिसके तहत रजस्वला महिलाओं को वहां जाने की मनाही है. इससे इंकार नहीं कि यह एक पुरानी परंपरा है लेकिन क्या यह भेदभाव करने वाली परपंरा नहीं. आखिर ईश्वर के घर यानि मंदिर के महिला पुरूष में भेद क्यों. यह एक तथ्य है कि अपने देश में धार्मिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के नाम कई ऐसे रीति रिवाज कायम है जो माननीय गरिमा के अनुकूल नहीं हैं.
,   संत समाज की पुकार को आगे बढाते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने इस बात पर जोर दिया है कि नरेन्द्र मोदी की सरकार को कानून बनाकर राम मंदिर बनाने का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए. संघ भी चाहता है कि केन्द्र सरकार को विश्व हिंदू परिषद से टकराव के रास्ते से बचना चाहिए. इस मामले में मोदी को अटल की नीति पर चलना पड़े तो कोई बुराई नहीं है. 1 अक्टूबर की सुबह साढ़े पांच बजे से महंत परमहंस दास के अनशन पर बैठते ही अयोध्या का माहौल गरमा गया. यह तपस्वी छावनी की साख का परिणाम ही था कि महंत के अनशन शुरू करते ही अयोध्या के सभी शीर्ष मंदिरों के महत संत उनके समर्थन में आ गये. अनशन स्थल पर संतों की भीड़ तेजी से बढने लगी.
,   मोदी तुझको आना होगा मंदिर यहीं बनाना होगा जैसे नारे लगाकर संतों ने अपने आक्रामक तेवर जाहिर कर दिये. महंत को मिल रहे समर्थन से प्रदेश की आदित्य योगी नाथ सरकार दबाव महसूस करने लगी. भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय सांसद लल्लू सिंह, अयोध्या के विधायक वेदप्रकाश गुप्ता समेत कई नेता महंत को मनाने पहुंचने पर सफल न हो सके. जैसे जैसे दिन बीत रहे थे संत की सेहत भी गिरती जा रही थी. शरीर में यूरिया का स्तर लगातार बढ़ रहा था. 7 अक्टूबर को महत परमहंस को मनाने जिले के प्रभारी मंत्री सतीश महाना भी पहुँचे लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल पाया. अंततः देर रात अधिकारियों ने महंत को जबरन अनशन स्थल से उठाकर लखनऊ के संजय गांधी चिकित्सा आयु विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया.
,   राम जन्म भूमि न्यास अयोध्या के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास कहते हैं केन्द्र और राज्य में भी भाजपा की सरकार होने के बावजूद मंदिर निर्माण में हो रही देरी से संतों में आक्रोश है. इंतजार से संतों का धैर्य जबाव दे रहा है. सुप्रीम कोर्ट 29 अक्टूबर से राम मंदिर बाबरी मस्जिद विवाद की सुनवाई शुरू कर रहा है. कोर्ट के नतीजे का इंतजार किये बगैर पिछले वर्ष तपस्वी छावनी के महंत की गददी पर बैठने वाले परमहंस दास ने इस मुददे को जिस तरह से तूल दिया है उससे कई सवाल खडे हो रहे हैं.
,   सुप्रीम कोर्ट में 8 फरवरी से अयोध्या मामले की सुनवाई शुरू होने के साथ ही विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर मुददे को धार देना शुरू कर दिया है. जैसे जैसे मामला लटकता गया राम मंदिर निर्माण में हो रही देरी से साधु संतों से विहिप नेता भी दबाव में आ गये. नई दिल्ली में 5 अक्टूबर को विहिप उच्चाधिकार बैठक में संतों के बीच पनप रहे गुस्से को शांत करने के लिए ही एक विस्तृत कार्य योजना बनाई गई.
,   विहिप के झंडे तले संतों का प्रतिनिधि मंडल राष्ट्रपति से मिला और संसद से कानून बनाकर मंदिर निर्माण की राह खोलने का अनुरोध किया. विहिप के अयोध्या में मीडिया प्रभारी शरत शर्मा बताते हैं. हर प्रांत के प्रतिनिधि कानून बनाकर मंदिर निर्माण की मांग कर प्रस्ताव पर प्रांत से राज्यपाल के जरिये राष्ट्रपति को भेजेंगे. नवम्बर में हर संसदीय क्षेत्र में हर विशाल जनसभा और 18 दिसम्बर से 1 एफ्ते तक देश के हर पूजा स्थान में राम मंदिर निर्माण के लिये धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन किया जायेगा.
,   राम मंदिर मसले पर विहिप की साख दांव पर है. अगर सुप्रीम कोर्ट 29 अक्टूबर से दिन प्रतिदिन सुनवाई नहीं करता है तो केन्द्र सरकार पर कानून बनाकर मंदिर निर्माण की मांग करने के लिए अगले कुंभ में होने वाली धर्म संसद में विश्व हिंदू परिषद किसी बड़े हमले की घोषणा भी कर सकती है. विहिप मंदिर निर्माण के लिए कितनी तैयार है इसका अंदाजा कार सेवक पुरम में श्रीराम जन्म भूमि न्यास कार्यशाला से लगाया जा सकता है. 2006 तक इस कार्यशाला में पत्थरतराशी का 50 फीसदी कार्य पूरा हो गया था और अगले 12 - 15 प्रतिशत के करीब ही पत्थर तराशे गये हैं. राम मंदिर के गर्भ गृह से भूतल के लिए तैयार पत्थरों पर काई जम गई है जिसे छुडाना ही सबसे बड़ी चुनौती है. कार्यशाला की निगरानी कर रहे गिरीश भाई सोमपुरा कहते हैं कोई भी मंदिर निर्माण का निर्णय होने पर कर्मचारियों की संख्या बढाकर समय पर कार्यशाला का काम पूरा कर लिया जायेगा.
,   अयोध्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और संतों की बढती गतिविधियों के बीच योगी आदित्यनाथ सरकार पिछले वर्ष की तरह इस बार भी रामनगरी में अपनी धमक दिखाने में जुट गई है. प्रदेश सरकार ने 4 से 6 नवम्बर के बीच अयोध्या में दीपोत्सव कार्यक्रम का खाका खींचा है. पिछले वर्ष अयोध्या के घाटों पर 2 लाख दीप जलाकर पिछला रिकार्ड तोडने की कोशिश में है. लोकसभा चुनाव आते ही एक बार फिर अयोध्या राजनैतिक फसल काटने की तैयारी शुरू हो गई है.
,   संघ प्रमुख के संदेश या आदेश के 24 घंटे भी नहीं बीते कि उत्तरप्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने हिंदू वाहिनी और दूसरे लोगों का आह्वान करते हुए राम मंदिर निर्माण में लग जाने का ऐलान कर दिया. इससे इतना तो स्पष्ट हो गया कि योगी को उत्तरप्रदेश भेजने का फेसला केवल राम मंदिर को ध्यान में रखकर किया था. ऐसा लगने लगा है कि भागवत इस दिशा में तेजी से आगे बढते दिखाई दे रहे हैं और उनका सपना साकार होने को है और उनके जीवनकाल में यह काम होता दिख रहा है.
,   भारतीय जनता पार्टी और संघ के अनुवांशिक संगठनों भूमिकायें बदलती नजर आ रही हैं. पहले जो काम उमा भारती, कल्याण सिंह या प्रवीण तोगड़िया करते थे वह जिम्मेदारी केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को सौप दी गई है. गिरिराज सिंह लम्बे समय से मंदिर और दूसरे मुद्दों पर बयान देते रहे हैं जो केवल खबरों ही नहीं बहस का मुद्दा भी बनता रहा है लेकिन भागवत के उद्बोधन के बाद मंदिर मुद्दे को तेजी से हवा दी जा रही है.
,   गिरिराज सिंह ने कहा मुसलमान बड़ी संख्या में मंदिर बनवाने के लिये तैयार है जो नहीं है वह भी साथ आये नहीं तो ज्वाला भड़केगी. उनके बयान से मुस्लिामों की राजनीति करने वाले बौखला गये हैं. कई धर्म गुरुओं का मानना है कि केन्द्रीय मंत्री देश को बाटने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उनके बयान से भाजपा को कोई फर्क नहीं पड़ता है. भाजपा प्रवक्ता सुधान्शु त्रिवेदी ने साफ तौर पर कहा कि हमारे मंत्री ने कुछ गलत नहीं कहा है. फिर केवल मंदिर ही क्यों जनसंख्या में नियंत्रण पर गिरिजा के बयान पर कोई बोलने को तैयार नहीं था.
,   दरअसल तीन राज्यों के चुनाव और 2019 के लिये संघ और भाजपा रास्ता तैयार करने में लगी हुई है. उधर 25 से 27 अक्टूबर लखनऊ में संघ के क्षेत्र प्रचारकों की बैठक हो रही है जिसमें संभावित मंदिर मुद्दे की रणनीति तैयार हो सकती है. इसमें उत्तरप्रदेश के भाजपा अध्यक्ष महेन्द्रनाथ पाण्डे भी मौजूद रहेगें लेकिन मुख्यमंत्री योगी को इस बैठक से दूर रखा गया है. सबकी निगाहें इस बैंठक पर लगी हुई हैं.
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