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कितना समृद्ध है मध्यप्रदेश

udaybhoomi 23/10/2018/span> Technology

विकल्प शर्मा : भोपाल : मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव को धार देने के लिये समृद्ध मध्यप्रदेश नाम से एक अभियान चलाया है. इसके अंतर्गत पार्टी ने पिछले दिनों 52 रथ 52 जिलों में भेजे है जो पार्टी की राय जानेगें. यह हैरान करने वाला है. 20-25 दिनों में जनता क्या राय देगी और किस तरह की समृद्धि लाने की कोशिश की जा रही है. यह अपने आप में एक सवाल है.
,   जो काम चुनाव से तीन साल पहले करना चाहिये था वो मात्र 25 दिन पहले किया जा रहा है. इस पर भोपाल के एक होटल मे काम करने वाली मोहिनी कहती है क्या भाजपा को इस बात का मलाल है कि मध्यप्रदेश समृद्ध नहीं हो पाया. ऐसे में जो भी फीड बैक आयेगा वह फर्जी होगा और लोग राय देने से बचते रहेगें. उसी तरफ भाजपा कार्यालय में बैठे लोगों का मानना है कि यह केवल रस्म अदायगी है. न तो कुछ होने वालो है. न कुछ बदलने वाला है. मतदाता तो पहले ही तय कर चुका है कि उसे क्या करना है. इसके लिये अलग से किसी कार्यक्रम की जरूरत नहीं है. दरअसल पार्टी इसी राय के आधार पर अपना विजन दस्तावेज तैयार करता चाहती है. पार्टी का खुद का विजन ही स्पष्ट नहीं है, तो किसी दस्तावेज की बात की जा रही है.
,   दरअसल दबाव की राजनीति में शिवराज को लोग भूलते नजर आ रहे हैं. लोग यहां तक कहते है कि मुख्यमंत्री ने तो अपना काम किया है लेकिन सरकार भले ही भाजपा की लेकिन चेहरा बदलना चाहिये. पार्टी भी संघर्ष के लिये तैयार दिख रही है. इसी क्रम में 12 से 15 सांसद विधान सभा चुनाव लड़ने की तैयारी में है. केन्द्र प्रदेश केबिनेट में उनके लिये रास्ता बनाना चाहता है. इस संभावना को भागवत के इस बयान से भी बल मिलता है कि 17 मंत्रियों सहित 65 से 70 विधायकों को बाहर का रास्ता दिखाता जा सकता हैं.
,   मध्यप्रदेश में पत्रकार और सत्ता के गठजोड़ का मामला नया नहीं है यह परम्परा दशकों से चली आ रही है. दरअसल इस परम्परा को तो कांग्रेस के समय से ही परवान चढ़ाया जा रहा है. भाजपा के राज्य में कुछ पत्रकारों ने छोटे फायदे हासिल करने के लिये थोड़ा बहुत हासिल कर लिया. हां इतना जरूर रहा कि राजनीतिक गुटों की तरह पत्रकारों ने भी अपने गुट बना लिये तो कुछ शिवराज के खेमे में चले गये तो एक गुट को प्रभात झा जैसे नेताओं ने शरण दी वही कैलाश विजयवर्गीय का भी एक खेमा है जो उन्हें चढ़ाने का काम करता रहा है. लेकिन कांग्रेस के शासन काल में नई दुनिया के पत्रकार स्व. मदन मोहन जोशी कांग्रेस के इतने करीब रहे कि उन्होने अपने प्रभाव से जवाहरलाल नेहरू केंसर अस्पताल तक बनवा लिया.
,   वही भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर जो पहले नवभारत में थे और सत्ता में कुछ प्रभावित लोगों के करीब रहते हुए उन्होने सप्रे संग्राहलय खड़ा कर दिया जो आज उनकी सम्पत्ति में चार चांद लगा रहा है. ऐसी ही खेल में कुछ मछलियां भी है जो लगातार अपने हुजूर का इस्तेमाल कर रही है. इसमें दिल्ली से प्रकाशित एक प्रमुख अखबार के ब्यूरो चीफ का नाम कांग्रेस के शासन काल से लेकर आज तक चर्चा में बना हुआ है. म.प्र. में जो भी मुख्यमंत्री में आया वह इनके प्रभाव से बच नहीं सका. अरुण दीक्षित नाम के इस पत्रकार ने जबरदस्त दाव पेंच से अपने को सत्ता के ऊंचे आसन पर बैठे लोगों को प्रभावित करता रहा. विद्याचरण शुल्क से लेकर शिवराज सिंह चौहान तक इस व्यक्ति के मोहपाश से बच नहीं पाये. मलय श्रीवास्तव, राजूरकर, संजय पाठक, संजीव जैन जैसे कुछ नाम भी चर्चा में रहे हैं.
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