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ध्रुवीकरण होना भारतीय राजनीति का

udaybhoomi 23/10/2018/span> Technology

ध्रुवीकरण होना भारतीय राजनीति का
,  विकल्प शर्मा : नयी दिल्ली : कांग्रेस नरम हिंदुत्व की दहलीज पर खड़ी है तो सपा और तृणमूल कांग्रेस भी उसी रास्ते पर चलती दिख रही है जिसके लिए वह भारतीय जनता पार्टी को कोसती थी.
,   दरअसल भाजपा की कामयाबी इन पार्टियों को बहुसंख्यक मतदाताओं को धर्म के नाम पर रिझाने का सबक सिखाती है और वह बेसबब नहीं है. हिंदुत्ववादी कही जाने वाली भाजपा ने करीब 7 करोड़ वोट हासिल कर लोकसभा की 282 सीटों के साथ जोरदार जीत दर्ज की और फिर तीन साल बाद उसने उत्तरप्रदेश विधानसभा का चुनाव भी भारी बहुमत से जीत लिया.
,   देश के इस सबसे बड़े सूबे और विधानसभा की 403 में से 272 सीटें भाजपा अपने खाते में करने में सफल रही. प्रदेश के अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मुददा पार्टी के 2014 के लोकसभा चुनाव के घोषणा पत्र के एजेण्डे में था. इस दौरान पार्टी ने जमकर हिंदुत्व का कार्ड खेला और धार्मिक ध्रुवीकरण में कामयाब रही. ऐसे में पिछले लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने स्पष्ट कर दिया कि भाजपा ने हिंदुत्व को अपने केन्द्र में रखते हुए अपनी विरोधी पार्टियों के मुस्लिम वोट बैंक को प्रभावी नहीं होने दिया. लिहाजा भाजपा विरोधी पार्टियों ने हिन्दू वोटर नाराज न हो इसको लेकर हिंदू देवी देवताओं की पैरोकारी तेज कर दी है. मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल के खुद को हिंन्द धर्म में आस्था दिखाने और कैलाश मानसरोवर से लेकर विभिन्न मंदिरों की यात्रा करने को भी इसी रूप में देखा जा रहा है. हालाकि राहुल संसद में स्पष्ट कर चुके हैं उन्हें हिंदुत्ववाद में नहीं हिंदू धर्म में आस्था है.
,   वैचारिक अंतरविरोध के बावजूद वामपंथी दलों ने भी मंदिर और हिंदू धर्म को लेकर अपना रुख लचीला कर लिया है. वहीं केरल भाजपा के अध्यक्ष पी.एस. श्रीधरन पिल्लै कहते हैं कि दरअसल वामपंथी पार्टियों को पता चल गया है कि बिना हिंदू वोटों से उनका काम नहीं चलेगा. केरल सरकार को पता है कि सुरेन्द्रन पर कार्यवाही करने से हिंदू वोटर नाराज हो जायेंगे. यह राज्य में भाजपा की बढती ताकत का परिचायक है कि खुद को नास्तिक बताने वाले वामपंथी भगवान की शरण में जा रहे हैं. एलडीएफ सरकार की यह मंदिर नीति सीधे तौर पर हिंदू वोटों को नाराज करने से रोकने की कोशिश दिखती है.
,   इसी तरह पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों के साथ भाजपा की घुर विरोधी टी.एम.सी. प्रमुख ममता बनर्जी हिजाब पहनने और कलमा पढने की सियासत से निकल रामनवमी मनाने का एलान करने से खुद को नहीं रोक सकी. ममता बनर्जी ने 2017 में रामनवमी का जुलूस न निकालने का आदेश अपने कार्यकर्ताओं को दिया लेकिन अचानक उन्हें अहसास हुआ कि हिन्दू वोटर उनसे दूर जा रहे हैं. तो इस बार जुलूस निकालने का आदेश उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को दिया. 2014 में ममता बनर्जी मोदी लहर को बंगाल में रोकने में कामयाब रही । खुलेआम मुस्लिम वोटों की पेरोकारी करने वाली ममता जब 2016 में दोबारा मुख्यमंत्री बनी तो उन्होंने सरस्वती पूजा और मूर्ति विसर्जन के लिए स्थल तय किये थे जिसे भाजपा ने पूजा पर अंकुश लगाने की साजिश बताई. मामले की गंभीरता को देखते हुए अगले साल ममता ने मूर्ति विसर्जन के लिए रास्ते तय करने की कवायद छोड दी. राज्य के पंचायत चुनावों में भाजपा के प्रभावी प्रदर्शन और उसके बढते काडर को देखते हुए ममता ने अपने रुख को लचीला कर लिया. पश्चिम बंगाल के भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं कि यह भाजपा की नैतिक जीत है कि मुख्यमंत्री को रामनवमी मनाने का फैसला करना पडा. पिछले साल उन्होंने इसका विरोध किया था।
,   आगामी आम चुनाव के सियासी दांव पेंच में 80 लोकसभा सीट वाला उत्तरप्रदेश बेहद अहम है. यहां खुद को मुस्लिम वोटरों को सबसे बडी हितेषी बताने वाली सपा भी अब प्रमुखता से हिंदू देवी देवताओं की बात करने लगी. अखिलेश यादव ने सत्ता में आने पर चम्बल - यमुना के बीहड़ों में विष्णु मंदिर बनाने की घोषणा की. कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच जब राहुल गांधी पहुंच रहे हैं हर हर भोले के नारे लगा रहे हैं.
,   दरअसल विपक्षी दल भाजपा की उस रणनीति को कुन्द करना चाहते हैं जिसके तहत ध्रुवीकरण का माहौल बनता है. भाजपा विरोधी दल यह अच्छी तरह समझते हैं कि ध्रुवीकरण की स्थिति में खासकर हिंदी पटटी में भाजपा से मुकाबला करना कठिन है. बिहार झारखंड, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ में कुल मिलाकर लोकसभा की 258 सीटें हैं. जहां विपक्ष भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है.
,   कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि धुवीकरण का माहोल बनाकर संघ के लोग बहुसंख्यक वोटों को एकजुट रखने की चाल चलते हैं वहीं भाजपा विरोधी दल मुस्लिम पैरोकारी की बात करते थे और इसमें मुसलमान वोट बंट जाता था लेकिन यह मौका अब भाजपा को नहीं मिलेगा. बीते दो साल में विपक्षी दलों ने ऐसा माहोल बना दिया कि भाजपा को अपना वोट बैंक इकटठा रखने में मुश्किल हो रही है. सत्ता विरोधी रुझान के कारण इस बार हिंदु वोट बैंक में बंटवारे को रोकना सबसे बड़ी चुनौती है.
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