Latest News

प्रयागराज : नाम में बहुत कुछ है साहब

udaybhoomi 25/10/2018/span> Technology

रजनीकांत वशिष्ठ : नयी दिल्ली : देश के नामी गिरामी शहर इलाहाबाद का नाम अब प्रयागराज है. यह एक परिवर्तन है. परिवर्तन प्रकृति का नियम है. परिवर्तन दो प्रकार से हो सकता है. प्राकृतिक परिवर्तन यानी जिसे प्रकृति तय करती है. भौतिक परिवर्तन जिसे प्रकृति की गोद में बसे जीव तय करते हैं. प्रकृति पर किसी का बस नहीं है पर प्रकृति के अनुकूल ढालने का हुनर जीव में है.
,   एक जुमला है-नाम में क्या रखा है. ठंडे दिमाग से विचार करिये तो नाम में शब्द हैं और शब्द ही ब्रह्म होता है. शब्द के गर्भ में होता है ज्ञान. नाम, शब्द और ज्ञान से उद्देश्य उपजता है. नाम, शब्द, ज्ञान और उद्देश्य से कर्म, जप, तप, योग और साधना का जन्म होता है. जहां जीवन है वहां कोई नाम है. जहां जीवन नहीं भी है उसकी भी पहचान किसी नाम से ही तो है. नाम देने की क्षमता पृथ्वी की सबसे सुंदर रचना नर और नारी में ही है. ये दोनों ही मिल कर सामूहिकता में जब होते हैं तो देश काल परिस्थिति के अनुसार किसी नाम की रचना होती है.
,   इस दृष्टि से इलाहाबाद का भी अपना अर्थ है और प्रयाग का भी. जीव, जन्तु क्या वनस्पति कोई भी जल के बिना नहीं जी सकता. चांद, मंगल पर अब तक न जाने कितनी कालोनियां बस गयीं होतीं अगर वहां जल होता. इसीलिये भारत और दुनिया भर में बस्तियां नदियों के किनारे बसीं. जहां दो नदियों का मिलन बिंदु हुआ वो स्थान मानव जाति के लिये और भी पावन हो गया. ऐसे स्थान को प्रयाग नाम दे दिया गया. संस्कृत में प्र का अर्थ श्रेष्ठ और याग का तात्पर्य याग या यज्ञ से है. अर्थात जप तप यज्ञ का श्रेष्ठ स्थल क्योंकि जीवन का आधार जल वहां प्रचुर मात्रा में होता है. उत्तराखंड में देवप्रयाग, कर्णप्रयाग ऐसे ही स्थल है जहां दो नदियां मिलतीं हैं. वहां से कई सहायक नदियों को अपने में समाते हुए गंगा और यमुना जब अपनी तीसरी बहन ज्ञान की सरिता सरस्वती से आ मिली, उस जगह को मालुम नहीं कब से प्रयागराज नाम दे दिया गय. तीन नदियों का ऐसा संगम दुनिया में और कहीं नहीं है.
,   प्रयागराज यानी वो स्थल जहां न जाने कब से भारतीय संस्कृति, आस्था, आस्तिकता, नास्तिकता के अनुसार जप-तप याग-योग का आयोजन होता रहा. असंख्य लोग यहां हर बारह वर्ष के बाद एक विशेष मुहूर्त काल में आस्था के वशीभूत होकर बिना किसी औपचारिक निमंत्रण के आते रहे. भावों और विचारों का मंथन करते रहे. आस्था का आधार अंधविश्वास से नहीं कर्म, जप, तप, योग, यज्ञ और आत्मानुभूति रहा है. प्रयागराज में वैचारिक मंथन से जो कुछ अमृत पाते रहे उसी के आधार पर अगले 12 वर्षों तक जीवनयापन करते रहे. चाहे राजा हो या प्रजा. स्पष्ट है कि अरसे से भारत में श्रमण राजकाज की नीति निर्धारण का केन्द्र रहे हैं. राज्य से दूर आश्रम में बैठे गुरू का आसन सदैव राजगद्दी से उपर माना गया. तीर्थराज प्रयागराज और ऐसे ही तीन और स्थलों-हरिद्वार, नासिक, उज्जैन में नाद, योग, यज्ञ, तप और मांत्रिक उर्जा से उत्पन्न सतत प्रवाहमान संस्कृति के कारण भारत के लोग मजबूत धागे में बंधे एक राष्ट्र के नागरिक हैं.
,   भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा और सम्पन्नता के दर्शन के लिये दुनिया भर से विचारक यहाँ कुछ देने, कुछ लेने आते रहे. तो कुछ सोने की चिड़िया को लूटने और उस पर कब्जा करने के इरादे से भी आये. भारत ने सदैव ही अतिथि देवो भव की परम्परा का निर्वहन किया. अपने ही लोगों की कमजोरियों के चलते भारतीयों ने कुछ काल के लिए आक्रांता को भी अपना भाग्य नियंता मान लिया. पर इसे भारतीय संस्कृति की जिजीविषा और श्रेष्ठता ही कहा जायेगा कि हजार साल तक कुचले जाने के उपरान्त भी उसका अस्तित्व मिट नहीं सका. बल्कि आज और भी चमक-धमक निखर कर सामने आया है.
,   भारत मे नाम परिवर्तन का चलन नया नहीं है. फारसी, अफगानी, मुगल, पुर्तगाली, अंग्रेज यहां आये तो इस इरादे से कि भारत की संस्कृति को मटियामेट करके अपने आचार विचारों का भी साम्राज्य यहां स्थापित कर देंगे. अपनी पूजा पद्धति, वास्तुकला, नगरों का नामकरण थोपने जैसा हर नुस्खा उन्होंने आजमाया. कुछ हद तक कामयाब भी हुए पर सनातनी छतरी इतनी विशाल निकली कि ये सब करने के बाद भी भारतीय सभ्यता और संस्कृति को मिटा नहीं पाये. अलबत्ता भारतीयों ने उनके रहन सहन, खानपान, बोलचाल में जो कुछ भी अच्छा था उसे गोद ले लिया. जो लुटेरे थे लूट कर चले गये जो यहां रह गये उन्हें हमने प्रेम सेअपना लिया. कुछ भी घटा नहीं और सवाया हो गया.
,   इसी क्रम में तीर्थराज प्रयाग का नाम बदल कर बादशाह अकबर के काल में इलाहाबाद कर दिया गया. बादशाह को ये स्थल इतना मनोहारी लगा होगा कि उसे कहना पड़ा-अल्लाह ने इसे आबाद किया है। तब दो कारणों से उसने नया नामकरण किया होगा. एक-उसका शासन काल भारतीयों की स्मृति में चिरस्थायी हो जाये. दो-वो इस्लामी सस्कृति के प्रचार प्रसार का भी एक स्थल बन जाये. अब प्रयागराज नाम की पुनर्स्थापना का विरोध करने वालों से यह पूछा जाना चाहिये कि तब अकबर ने प्रयागराज ही नाम क्यों नहीं रहने दिया, नाम क्यों बदला. ऐसा नहीं कि जब इस पवित्र स्थल का नाम बदला गया था तो इसका विरोध नहीं हुआ होगा. गोस्वामी तुलसीदास अकबर के ही समकालीन कवि थे. उन्होंने इस परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया और लिखा-छेत्रु अगम गढ़ गाढ़ सुहावा, सपनेहुं नहिं प्रतिपक्षिन भावा. और यह भी लिख डाला कि- को कहि सकइ प्रयाग प्रभाउ.
,   प्रयागराज नाम की पुनर्स्थापना पर हाय हाय करने वालों को यह भी नहीं भूलना चाहिये कि पहले ईरान का नाम पर्शिया हुआ करता था. आज का म्यांमार पहले बर्मा हुआ करता था. कम्पूचिया पहले कंबोडिया था. ब्रिटिश काल में श्रीलंका सीलोन के नाम से जाना जाता था. जार्डन बदला हुआ नाम है. भारत में बाम्बे का नाम मुंबई हो गया. बगलौर बंगलुरू हो गया. केरल में त्रिवेंद्रम का नया नाम तिरुवनंतपुरम हो गया. मद्रास चेन्नई हो गया. कलकत्ता कोलकाता हो गया. पांडिचेरी आज पुड्डुचेरी है. वाराणसी पहले बनारस था. तब किसी ने होहल्ला नहीं किया. तो अब प्रयागराज के लिये हाहाकार क्यों ? इसलिये कि यह नाम भारतीय आस्था, परम्परा और आस्तिकता का प्रतीक है. नोयडा, ग्रेटर नोयडा बना कर नये शहरों के नाम रखे जा सकते हैं पर प्रयागराज बनाया नहीं जा सकता. प्रकृति और संस्कृति ने खुद इसे बसाया है.
,   समाज जड़वत नहीं होता। भारत में देखा गया है कि लोगों के 80 प्रतिशत नाम कृष्ण या राम के प्रतीकों से जुड़े हैं. अपने बच्चों का नाम लोग रावण, कंस या हिरणाकश्यपु क्यों नहीं रख लेते ? इसलिये कि नामकरण में संस्कृति, सभ्यता और इतिहास के दर्शन होते हैं. प्रेरणा मिलती है. आहत करने वाली स्मृतियों को कोई याद नहीं रखना चाहता. उन्हीं नामों को याद रखना और अपनाना लोग पसंद करते हैं जिनसे उर्जा का संचार हो. प्रयागराज ऐसा ही नाम है जो अनंत काल से भारतीय मनीषियों को आह्लादित करता आया है और जनमानस को सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता आया है. तो इसका स्वागत होना चाहिये. इलाहाबाद का भी स्वागत कि उसने इतने वर्षों तक प्रयागराज के राज को ज्यों का त्यों कायम रखा.
,  
,  

Related Post