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इंसानियत के सेवक के रूप में याद रहेंगे एन डी तिवारी

udaybhoomi 28/10/2018/span> Technology

राजकुमार शर्मा : मुंगावली : खाटी समाजवादी थे तिवारी जी, उन्होंने जीवन भर गांधी-नेहरू टोपी नहीं पहनी, वे समाजवादी टोपी जिसका रंग सफेद नहीं होता था पहनी. जब तिवारी जी ने तिवारी कांग्रेस बनाई थी उसी वक्त उनकी टोपी को लेकर पंडित लोकपति त्रिपाठी ने सवाल उठाकर तिवारी जी को कहा था कि उनकी टोपी गांधी टोपी नहीं है, वह समाजवादी रंग की है. तिवारी जी ने कांग्रेस के नेता रहते अपनी टोपी कभी नहीं बदली.
,   अखण्ड उत्तर प्रदेश के शिल्पी, उत्तराखण्ड के विकास पुरुष राजनीति के ‘अजात शत्रु’नारायण दत्त तिवारी के निधन से गांव से लेकर हिमाचल के पहाड़ी गांवों तक शोक की लहर व्याप्त है. तीन बार अविभाजित उत्तर प्रदेश एवं एक बार उत्तराखण्ड के पूरे पांच साल तक मुख्यमंत्री रहकर तिवारी जी ने जनसेवा का एक कीर्तिमान स्थापित किया. उनका प्रशासन दलगत भावना से ऊपर उठकर सबके विकास के लिए एक अलग पहचान रखता रहा. तिवारी जी की सरकार के कार्यों की सराहना उनके दल से ज्यादा विपक्ष के लोग करते थे. इन्हीं खूबियों के कारण तिवारी जी का पंडित अटल बिहारी बाजपेयी, सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव सहित कई छोटे-बड़े दलों के नेताओं से प्रगाढ़ सम्बन्ध रहा. सभी उनका दलगत भावना से ऊपर उठकर आदर करते थे. तिवारी जी ने सबका सम्मान किया.
,   उत्तरांचल के विभाजन के बाद तिवारी जी ने बड़ी सोच के साथ राज्य का विकास मुख्यमंत्री रहकर किया. तिवारी जी अपने राजनैतिक प्रगाढ़ता का लाभ आम जनता को दिलाने के सदैव पक्षधर रहे. पंडित अटल बिहारी बाजपेयी (पूर्व प्रधानमंत्री) से तिवारी जी के प्रगाढ़ सम्बन्ध रहे, उस प्रगाढ़ता का पूरा लाभ उन्होंने देवभूमि (उत्तरांचल) के मुख्यमंत्री रहते वर्ष 2002 में अटल जी से विशेष अनुकम्पा पूर्वक उत्तराखण्ड को औद्योगिक पैकेज दिलाकर हिमालयी राज्य के विकास को पंख लगाने का काम किया. जनता को त्वरित न्याय मिले, इस अवधारणा के पोषक अपने नाम की व्याख्या भी एनडी तिवारी को नो डिले तिवारी के रूप में करते हुए काम भी उसी तर्ज पर करते थे.
,   अपने 93वें जन्मदिन पर तिवारी जी ने अन्तिम सांस भी ली थी. यह गजब संयोग ही रहा कि जिस दिन चिकित्सालय में उनका जन्मदिन मना उसी दिन उन्होंने नश्वर शरीर का परित्याग भी किया. तिवारी इधर कई माह से गम्भीर बीमारी के जद में रहे. उनकी जबान पर कभी-कभी कबीर दास के दोहे, कभी स्वतंत्रता आंदोलन में गाये गीत सुने जाते थे. ‘मय न मुआ न माया मुयी, मुयी-मुयी जात शरीर’.अपने अन्तिम पड़ाव में तिवारी जी मय (अहंकार) माया (अपना-पराया) से विरत रहना चाहते थे.
,   तिवारी जी का जन्म हिमालयी क्षेत्र नैनीताल के बल्यूटी गांव में हुआ था. नैनीताल से पढ़ाई पूरी कर तिवारी जी उच्च शिक्षा के लिए प्रयागराज स्थित इलाहाबाद विश्वविद्यालय गये. स्नातकोत्तर एवं कानून की पढ़ाई पूरी कर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेते हुए देश की आजादी में अपना योगदान किया. यह भी एक संयोग ही था कि जिस वर्ष 1947 में देश को ‘अंग्रेजी शासन से मुक्ति’मिली, उसी वर्ष तिवारी जी को इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ का अध्यक्ष चुना गया. 1947 से 1949 तक आल इंडिया स्टूडेन्ट कांग्रेस का सचिव रहने का अवसर मिला. गांव की गलियों में गांधी का तिरंगा उठाने वाले तिवारी जी को कांग्रेस की राजनीति रास आयी. तिवारी जी सदैव कांग्रेस के कद्दावर नेता के साथ गांधी-नेहरू परिवार के खेवनहार एवं संकटमोचन की भूमिका में रहे. राजीव गांधी के निधन के बाद गांधी परिवार की जड़ें दरकने से बचाने के लिए उन्होंने अर्जुन सिंह के साथ मिलकर ‘तिवारी कांग्रेस’बनाकर सोनिया गांधी को मजबूती प्रदान की. राजनीति में‘अजात शत्रु’रहे तिवारी जी को पराजित करने के लिए उत्तराखण्ड के उनके धुर विरोधी एक नेता ने राजभवन में लड़कियां भेजकर उनको बदनाम करने में सफलता हासिल की.
,   फर्श से उठे, अर्श पर पहुंचे मुख्यमंत्री व केन्द्रीय मंत्री रहे तिवारी जी ने अपने शुरुआती दौर में एक वक्त के खाने पर ट्यूशन पढ़ाकर ईमानदारी काबिलियत का इतिहास रचा. उनकी निष्ठा एवं कठिन मेहनत ने उन्हें राजनीति का शिखर पुरुष बना दिया. 1952 में नैनीताल से सबसे कम उम्र का विधायक बनने का अवसर उन्हें मिला। 1962 में चुनाव हारने के बाद तिवारी जी ने पत्रकारिता की राह चुनी. नेशनल हेराल्ड समाचार पत्र ने उनकी काबिलियत को परख कर हेराल्ड का विशेष संवाददाता बनाकर अमेरिका भेज दिया. तिवारी जी ने विदेश जाकर जान एफ केनेडी के साथ अमेरिका का राष्ट्रपति बने लिंडन बेल्स जानसन का इंटरव्यू करके हेराल्ड को ऊंचाई प्रदान करते हुए एक सफल पत्रकार बने. 1969 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सीबी गुप्ता के मंत्रिमण्डल में मंत्री का पद संभाला. 1976 में पहली बार उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया. मंत्री, मुख्यमंत्री रहकर उन्होंने ‘इंसानियत’ की सेवा एक ‘इन्सान’बनकर की. 1976, 1984 एवं 1988 में तीसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. 1996 एवं 1999 में दो बार उन्हें सांसद बनने का अवसर मिला. 2002 से 2007 तक उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रहे. 22 अगस्त 2007 से 26 दिसम्बर 2009 तक आंध्र के राज्यपाल रहे. एक षडयंत्र के कारण उन्हें पद त्यागना पड़ा.
,   तिवारी जी को कांग्रेस के ‘इंदिरा युग’के आखिरी कद्दावर नेता के रूप में जाना जाता है. राजीव गांधी के निधन के बाद 1990 के दशक में कांग्रेस नेतृत्व के संकट से जूझ रही थी. उन दिनों तिवारी जी को भावी प्रधानमंत्री के रूप देखा जाने लगा था. गांव की पगडंडियों में पले बढ़े तिवारी जी को लोग गुदरी के लाल के रूप में जानते रहे. उनके जीवन में साथ-साथ चलती रही राजनीति और विवादों की यात्रा. उनके धुर विरोधी भी उनसे तमाम विवादों के बाद भी उनके राजनैतिक कौशल और विजन के मुरीद रहे.
,   नो डिले तिवारी की भूमिका उन्हें जीवन के अन्तिम क्षणों में भी पसंद रही. 2016 में हल्द्वानी पहुंचे तिवारी जी ने अन्तरराष्ट्रीय स्टेडियम के कार्य में धीमी गति से नाराज होकर ‘नो डिले तिवारी के तहत लोकर्पण करने की घोषणा कर दी. इसी वर्ष तिवारी जी ने हल्द्वानी के मेडिकल कालेज की बदहाली को देखकर अपनी सरकार के खिलाफ ही डा0 सुशीला तिवारी मेडिकल कालेज के गेट पर धरना दिया. इसी तरह वह रानीबाग में एचएमटी कर्मियों के आंदोलन के समर्थन में धरने पर बैठे थे. उनकी सपा से नजदीकी एवं भाजपा को 2017 में दिया गया समर्थन राजनैतिक गलियारे में चर्चा का विषय रहा. तिवारी जी को उनके निधन के बाद उत्तर प्रदेश में दलगत भावना से उठकर सम्मान मिला. हर वर्ग, धर्म के अजीज रहे तिवारी जी इंसानियत के सेवक के रूप में एक सच्चे इंसान के रूप में जाने जायेंगे.
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