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भाजपा के संकटमोचक हैं कैलाश

udaybhoomi 30/10/2018/span> Technology

विकल्प शर्मा : भोपाल : विधानसभा चुनाव की पूर्व संध्या पर कैलाश विजयवर्गीय की प्रदेश की राजनीति में ‘अधिकारिक’वापसी दर्शाती है कि भाजपा के सामने सत्ता में वापसी की चुनौती कितनी गंभीर बन गई है. सही में पूछा जाए तो विजयवर्गीय ने मध्यप्रदेश, खास करके मालवा-निमाड़, कभी छोड़ा भी नही था. दिग्विजयसिंह और कैलाश विजयवर्गीय के बीच दोस्ती दुश्मनी का रहस्य भी इसी सच्चाई में छिपा है कि दोनों की आत्माएं अपनी जान पहचान के इलाकों में ही हमेशा भटकती रहती हैं.
,   विजयवर्गीय ने प्रदेश की राजनीति से दूरी अमितशाह के कहने से बनाई थी. अब वापसी भी उन्हीं के इशारे पर ‘उड़ी जहाज को पंछी’ वाली स्टाइल में हुई है. जिन राजनीतिक बाध्यताओं के चलते विजयवर्गीय को दिल्ली में भी अपना घर ढूंढना पडा होगा, वे कम से कम चुनाव परिणाम आने तक के लिए तो निलंबित हो गई है. कोई छिपी जानकारी नहीं है कि जो महत्व प्रधानमंत्री के लिए अमित शाह का है उससे मिलता जुलता ही महत्व राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए विजयवर्गीय को लेकर है.
,   इस श्रृंखला को और नीचे ले जाएं तो विधानसभा क्षेत्र क्रमाँक-2 की तमाम हस्तियां एक एक करके जुड़ती जांएगी. पर अमित शाह और विजयवर्गीय के बीच जो मोटा फर्क है उसे भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. विजयवर्गीय को बढिया 'भोजन', अलग अलग ‘भेस’धारण करना और ‘भजन’गाना नापसंद है जो कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के बारे में पब्लिक जानकारी में नहीं है. जानकारी में यही है कि ‘कैलाश भाई’को देखते ही कार्यकर्ता उनसे भजन सुनाने की मांग करने लगते हैं और ‘अमित शाह’के दूर से भी दर्शन होते ही खुद भजन कीर्तन करने में जुट जाते हैं.
,   मुंबई की राजनीति में जो दबदबा शिवाजी पार्क और ‘मातोश्री’का है, वही इंदौरी राजनीति में नंदानगर इलाके का है. ऑटोवाले को सिर्फ नाम बताना पड़ता है, पता नहीं कि कहां जाना है. इक्का दुक्का अपवाद छोडकर इंदौर जिले के शेष भाजपा विधायक क्षेत्र क्रमांक दो में काफी सोच समझकर ही पैर रखते हैं. जन्म मरण के अवसरों पर भी वे क्षेत्र के ‘संबंधितों’की जानकारी में लाकर ‘यूं आया और यूं गया’जैसी तत्परता दिखाते रहे हैं. नगर निगम के बहुचर्चित ‘चांटा कांड’के बाद से तो क्षेत्र क्रमांक 2 और 4 के बीच दूरियां और भी बढ गई हैं. दो नम्बर विजयवर्गीय के राइट हैण्ड विधायक रमेश मेंदोला का इलाका है और चार नम्बर महापौर विधायक मालिनी गौड का क्षेत्र है. विजयवर्गीय और मुख्यमंत्री के मध्य औपचारिक मुस्कुराहटों वाले संबंधों की अफवाहों के बीच चर्चा यह भी बनी रहती है कि पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के ताई सुमित्रा महाजन के साथ भी रिश्ते ‘भावपूर्ण’नमस्कार वाले ही हैं।
,   ऊपर की पंक्तियों के इतने सारे कीर्तन का सार यही है कि मालवा निमाड़ की जिन 66 सीटों पर शिवराज सिंह के ‘हाथ’मजबूत करने की जिम्मेदारी विजयवर्गीय को सौंपी गई है, वहां पार्टी के अंदर और बाहर की स्थितियां न तो हरियाणा जैसा चमत्कार कर दिखाने जैसा है और न ही उत्तराखंड करना संभव है. पिछले पांच सालों में मालवा निमाड़ के राजनीतिक हालात भी बदल गए हैं. पिछली बार जब भाजपा को 66 में से 56 सीटों मिलीं थी, तब पार्टी के पास ही बहुत सारे ‘हीरो हीरालाल’थे. तब मैदान में न तो कोई डॉ. हीरालाल अथवा (जयस) था और न ही हीरालाल त्रिवेदी (सपाक्स). कहा जाता है कि मालवा निमाड़ की 66 सीटें भोपाल में सरकार बनाने के खेल में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाली हैं. चूंकि चुनौतियां स्वीकार करना और अपने सभी तरह के विरोधियों को ‘येन केन प्रकारेण’उनके मुकाम तक छोड़कर आना विजयवर्गीय की फितरत में रहा है. चारों ओर की नजरें अब उनकी दमदारी की वाीडियोग्राफी करती रहेगी.
,   विजयवर्गीय की यह ‘घर वापसी’परमानेंट है या टेम्परेरी, यह भी विधानसभा और उससे लगे लगे होने वाले लोकसभा चुनाव के नतीजे तय करेंगे. भाजपा नेतृत्व के साथ दिक्कत यह भी है कि उसके पास इन महत्वपूर्ण इलाकों के लिए विजयवर्गीय की टक्कर का कोई दूसरा मैदानी विकल्प मौजूद नहीं है. यही हालत कांग्रेस में दिग्विजय सिंह को लेकर है पर दिग्विजय सिंह के साथ प्लस प्वाइंट यह है कि उनका कहा मानने और न मानने में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को अपनी पीठ पर राहुल गांधी का डर नहीं सताता. विजयवर्गीय और क्षेत्र के कार्यकर्ताओं के बीच संबंधों की वैसी स्थिति बनने तक तो शायद चुनाव ही निपट जाएं. कैलाश विजयवर्गीय बनने के फायदे और नुकसान दोनों ही हैं.
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