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काशी टु हल्दिया

udaybhoomi 13/11/2018/span> Technology

रजनीकांत वशिष्ठ : नयी दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 12 नवम्बर 2018 को विश्व की प्राचीनतम नगरी काशी में सुनहरी इबारत से विकास की नयी कहानी का श्रीगणेश कर दिया. काशी यूं तो अरसे से नभ और थल मार्ग से सारी दुनिया से जुड़ा ही था. पर अब ये मानना पड़ेगा कि मोदी ने जल मार्ग से भी इसे पूरब से जोड़ कर अपने मतदाताओं का थोडा बहुत कर्ज तो चुका ही दिया है.
,   2014 में मोदी जब काशी की पावन धरती पर चुनाव लड़ने आये थे तो उन्होंने कहा था कि उन्हें मां गंगा ने बुलाया है. मां गंगा जो पापियों के पाप धोते धोते क्षीण, कृशकाय और इतनी मैली हो चलीं थीं कि उनका विश्वप्रसिद्ध अमृत सरीखा जल जो कभी खराब नहीं होता था उसके आचमन की बात तो दूर उससे स्नान भी बीमारियों को न्योता देने लगा था. उत्तर भारत की ऐसी सदियों से अविरल जीवन धारा को गुजरात के इस सपूत ने न केवल काशीवासियों के कचरे से बचाने का पुख्ता इंतजाम कर दिया बल्कि उसके गोद में व्यापार की ऐसी नयी राह खोल दी जिस पर चल कर पूरे पूर्वांचल के निवासी विकास और रोजगार की नयी रोशनी के दीदार कर सकते हैं.
,   आजादी के बाद से देश में सरकारें आती रहीं, जाती रहीं. देश की सदानीरा नदियों पर जल मार्ग खोलने के बारे में सोचा भी गया. प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में 1986 में उत्तर प्रदेश में गंगा, असम में ब्रह्मपुत्र और केरल में चम्पकरन नदियों को राष्ट्रीय जल मार्ग एक, दो, तीन का बाकायदा वैधानिक दर्जा भी दे दिया गया. पर उस दिशा में काम कोई धेला भर नहीं आगे बढ़ पाया. यानी बत्तीस सालों से नीति तो थी पर नियत नहीं थी या इच्छा शक्ति नहीं थी मालुम नहीं। पर उसी नीति पर मात्र साढ़े चार साल में अमल करके उसे साकार रूप देकर मोदी ने यह तो साबित कर ही दिया है कि अगर साफ नीयत हो और इरादा नेक हो तो कोई भी काम असंभव की श्रेणी में नहीं आता.
,   साफ नीयत का सवाल इसलिये यहां उठा सकते हैं कि बकौल विश्वकर्मा की हैसियत वाले केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी जहां सड़क मार्ग से किसी सामान को भेजने में दस रुपये का खर्च आता है और रेल मार्ग से छह रुपये खर्च होता है तो वहां जल मार्ग से यह खर्च मात्र एक रुपये ही होता है. तो फिर सस्ती ढुलाई के इस विकल्प को आखिर इतने समय तक उपेक्षित क्यों रखा गया ? इसमें किसका और क्या निहित स्वार्थ रहा होगा और क्यों ? चलिये मान लिया कि तब पैसा नहीं रहा होगा. तो आज कहां से आ गया. माना कि अब इस महत्वाकांक्षी और वृहत यज्ञ को संपन्न करने के लिये विश्व बैंक से कर्जा लिया गया है. तो क्या कभी पहले की सरकारें कटोरा लेकर विश्व बैंक के दुआरे खड़ी नहीं हुई ? भले ही विश्व बैंक से कर्जे लेकर उन सरकारों ने राजा महाराजाओं की तरह कर्जा माफी का पुण्य कमाया हो या फिर बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा के नाम पर जम कर घी पिया हो. पर ऐसी सार्थक योजनाओं में ईमानदारी से कर्जे की एक एक पाई लगाने की नीयत क्यों नहीं दिखायी गयी जिससे देश का भला होता ?
,   पिछली सरकारों को इस शानदार योजना की याद भी आयी तो आजादी के उनतालीस साल बाद. उनसे अच्छा तो अकबर बादशाह था जिसने चार सौ साल पहले ही गंगा और यमुना की इस ताकत को अंदाज लिया था. जल मार्गों पर शोध करके उसे पुस्तक रूप देने वाले वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह बताते हैं कि बादशाह अकबर इसी संभावना की तलाश में चार सौ नौकाओं के साथ प्रयाग आया था. उसने जल मार्ग बनाने के इरादे से ही यहां गंगा और यमुना के संगम पर ऐसी जगह पर एक ऐसे किले का निर्माण कराया जहाँ पर्याप्त जल था और जिसे बंदरगाह का रूप दिया जा सके। वो तो कड़ा के तत्कालीन बागी सूबेदारों के विरोध के चलते उसकी ये इच्छा जमीन पर नहीं उतर सकी. पर उसकी सोच को तो सलाम किया ही जाना चाहिये. हमारे लोकतंत्र के पिछले बादशाहों की बलिहारी कि उन्हें ये सब नजर ही नहीं आया, नजर भी आया तो प्राथमिकता की स्लेट पर बस वोट, वोट और वोट ही नज़र आते गये.
,   खैर अंत भला सो भला। हर समय विपक्ष के विष बुझे बाणों का आघात सहने वाले मोदी ने गाजीपुर के पास आने वाली नदी की कम गहराई की बाधा को अपने योग्य मंत्री गडकरी की काम मे डूबे रहने वाली शैली के सहारे पार करके काशी से हल्दिया तक जल मार्ग की जो राह खोली है उसके फायदे सुन लीजिये. एक कार्गो जहाज से एक बार में कोलकाता से 200 ट्रकों के बराबर माल की ढुलाई काशी तक 10-12 दिनों में की जा सकती है. सड़क या रेल मार्ग के जाम का झंझट नहीं. टोल टैक्स का लफड़ा नहीं. चाहे तो रो रो सर्विस के जरिये ट्रक समेत माल मंगा लीजिये और काशी में मल्टी माडल टर्मिनल पर उतार कर पूर्वांचल के दूरदराज इलाकों में पहुंचा दीजिये. ऐसे ही टर्मिनल साहबगंज, हल्दिया और गाजीपुर में बन रहे हैं. काशी का टर्मिनल 206 करोड़ की लागत से महज दो साल से कुछ ज्यादा दिनों में बन कर तैयार हो गया है.
,   काशी-हल्दिया जल मार्ग की कुल लम्बाई 1383 किलोमीटर है और इसे पूरी तरह तैयार करने में करीब 5369 करोड़ रुपये की लागत आनी है. हल्दिया यानी बंगाल की खाड़ी से जहां व्यापारिक उत्पाद आसानी से कम पैसे में पूर्वांचल तक आयेंगे तो पूर्वांचल से खाद, खनिज, कपड़े, कालीन और योगी सरकार की वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट योजना से बने हथकरघा सामान बंगाल और उससे भी दक्षिण पूर्व एशिया तक के बाजारों तक अपनी पहुंच बना सकते हैं और ढुलाई में कम लागत के चलते वहां के बाजारों की प्रतिस्पर्धा में टिक भी सकते हैं. देखा जाये तो इससे पूर्वांचल के कारीगरों के लिये व्यवसाय के नये अवसर ही पैदा होंगे. विपक्षी राजनीतिक दल युवाओं के लिये निकृष्ट चाकरी के वास्ते आठ आठ आंसू रो रहे हैं और मोदी जी प्रतिभाशाली युवाओं के लिये मध्यम बान के नये से नये रास्ते तलाश करके दे रहे हैं ताकि हमारा युवा कर्मठ और स्वाबलम्बी जीवन जी सके.
,   इस राष्ट्रीय जल मार्ग 1 से केवल व्यापारिक आवागमन ही नहीं होगा, पर्यटन के लिये रिवर क्रूज सर्विस भी काफी रोमांचक आइडिया है जो जल्द ही साकार होने वाला है. पत्रकार, लेखक अरविंद कुमार सिंह इस बात को मानते हैं कि इस इको फ्रेन्डली परिवहन से रोजगार के विकास की भी असीम संभावनाएं हैं. मिर्जापुर में तो पहले से ही काशी से भी अच्छे घाटों और टर्मिनल की संभावनाएं हैं. पर इसका पूरा फायदा तभी मिलेगा जब हल्दिया से काशी के मार्ग को प्रयागराज तक बढ़ाया जाये. इससे प्रयाग और मिर्जापुर से खनिज और खाद की सीधे ढुलाई तो होगी ही प्रयाग के कुंभ के कारण क्रूज पर्यटन की संभावनाओं को भी चार चांद लगेंगे. प्रयागराज में राष्ट्रीय जल मार्ग प्राधिकरण का क्षेत्रीय कार्यालय पहले से है ही. इस बारे में नितिन गडकरी कहते हैं कि कुछ ही महीनों में काशी से प्रयागराज का मार्ग भी खोल दिया जायेगा. इस मार्ग से डेढ़ घंटे में काशी से प्रयाग का सफर तय होगा.
,   मोदी पर ताने कसने वालों को अब चुप हो ही जाना चाहिये. वादियों, अपवादियों के आरोप लग रहे थे कि मोदिया काशी को उजाड़े दे रहा है. काशी के स्वरूप को नष्ट भ्रष्ट किये दे रहा हैं. तो मोदी ने जहां पुरानी काशी को आसमान में टंगे बिजली के तारों से मुक्ति दिला दी है, गलियों को सुधारा है, श्रद्धालुओं के आवागमन मार्ग को निष्कंटक किया है. वहीं काशी के आउटर हिस्से को अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस करके विदेशों से आने वाले पर्यटकों की शानदार अगवानी का इंतजाम कर दिया है. चाहे वो वाराणसी जंक्शन हो या मन्दुआदीह स्टेशन, बाबतपुर हवाई अड्डा या बस अड्डा या जाम से मुक्ति दिलाने वाले फ्लाईओवर. भोजन पका या नहीं ये बताने के लिये हांडी का एक दाना ही काफी होता है। वैसे ही बनारस में बचपन गुजारने वाली और अब कानपुर में बसी गृहिणी शिखा बताती हैं कि कोई कहे कुछ भी बनारस मंे मोदी जी ने काम तो बहुत कराया है। अंधविरोध के चलते किसी को दिखायी ही न दे और बात है। काशी अब सही मायने में पूर्वोत्तर भारत ही नहीं दक्षिणपूर्व एशिया का प्रवेश द्वार बानने की पूरी काबिलियत रखता है. ये मोदी की एक्ट ईस्ट पालिसी के सपने का एक हिस्सा ही है.
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