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व्यंग्य महोत्सव २०१८ का रायपुर पड़ाव

udaybhoomi 23/11/2018/span> Technology

रजनीकांत वशिष्ठ : रायपुर : उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ से माध्यम साहित्यिक संस्थान ने 1987 से हास्य व्यंग्य के अश्वमेध यज्ञ के जिस घोड़े को छोड़ा था. वो नवाबी अंदाज़ की नगरी में लम्बी साधना के बाद नोयडा, दिल्ली, चंडीगढ़, जबलपुर, भोपाल होते हुए अब रायपुर में भी अपनी कामयाबी का परचम फहरा चुका है. डा. हरिवंशराय बच्चन, डा. शिवमंगल सिंह सुमन, डा. चंद्रदेव सिंह, विद्यानिवास मिश्र, ठाकुर प्रसाद सिंह और अनूप श्रीवास्तव जैसे दिग्गज सरस्वती के साधकों ने आने वाली पीढ़ियों के लिए जिस पौधे को रोपा था उसे पांच वरिष्ठों के शांत होने के बाद 54 वर्षों से पत्रकार, व्यंग्यकार अनूप श्रीवास्तव ने इतने जतन से सींचा और खाद पानी की खुराक दी कि आज वो एक वटवृक्ष बन चूका है. यही नहीं 18 वर्षों से एक ऐसी हास्य व्यंग्य मासिक पत्रिका अट्टहास का सम्पादकीय भार अपने कन्धों पर उठाये रखा है जिसके स्नेह प्रसाद से शायद ही कोई समकालीन शीर्षस्थ व्यंग्यकार वंचित रहा हो और यह पत्रिका नए व्यंग्यकारों की तो जैसे नर्सरी ही बन गयी है. वो भी ऐसे में जब देश में निकलीं व्यंग्य पत्रिकाएँ कुछ वर्षों की मुंह दिखाई के बाद काल कवलित हो जातीं रहीं हों.
,   राग दरबारी के श्रीलाल शुक्ल के समय से ही हास्य व्यंग्य के बारे में एक यक्ष प्रश्न मुंह बाए खड़ा रहा है कि व्यंग्य लेखन को विधा माना जाये या नहीं. माध्यम और माध्यम की अट्टहास के रायपुर पड़ाव में यह सवाल उठ ही नहीं गया बल्कि संजीवनी फाउंडेशन के आतिथ्यभार से 18 नवम्बर को आयोजित व्यंग्य महोत्सव 2018 की गोष्ठी का बीज विषय बन गया- 'व्यंग्य के मानक : व्यंग्य परिदृश्य की चुनौतियाँ'. दिल्ली से आये देश के प्रख्यात व्यंग्यकार और आलोचक सुभाष चंदर ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में स्पष्ट कर दिया कि व्यंग्य विसंगतियों पर कलात्मक प्रतिक्रिया तो है पर विधा इसलिए नहीं है कि इसका कोई विधान अभी तक तय नहीं हो पाया है. जिसका विधान है वो विधा है. इसलिए व्यंग्य के भी कुछ मानक तो होने चाहिए. व्यंग्य के मानकों पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि व्यंग्य का शीर्षक तिर्यक होना चाहिए. विषय वस्तु में प्रहारात्मकता होनी चाहिए, उसमें सरोकारों का छौंका हो और भाषा शैली चुभती हुई हो. व्यंग्य वो है जो साहित्य की स्वीकृत विधा में तोड़फोड़ करता रहे. चाहे वो कहानी, कविता हो या उपन्यास. जब ये तोड़फोड़ होती है तो एक अलग चीज सामने आती है. कुल मिलाकर कहें तो पीड़ित, शोषित आम आदमी की आवाज़ बनना व्यंग्यकार का कर्म है. व्यंग्य में हास्य का पुट कितना हो यह लेखक पर छोड़ दिया जाना चाहिए.
,   रायपुर के विप्र भवन, समता कॉलोनी के सभागार में श्री चंदर ने हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, शंकर पुणताम्बेकर, लतीफ़ घोंघी, रविन्द्र त्यागी का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी रचनाएँ इसीलिए कालजयी बन सकीं क्योंकि वो मानवीय संवेदनाओं सी लैस थीं. तो फिर जो लेखन मानवता को बचाने की कोशिश करे वो व्यंग्य है. साहित्य की कोई भी विधा हो अगर वो मानवता को बचाने की बात न करे तो अगली पीढ़ी तक जिन्दा नहीं रह पाएगी. पर यह भी याद रखना होगा कि परसाई के समय का सच अलग था, आज समय अलग है. आज व्यंग्य को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने की चुनौतियाँ हैं. पाठक पढना चाह रहा है पर लेखक मानकों को ध्यान में रख कर रचना करे तो शायद अगली पीढ़ी तक व्यंग्य को सम्प्रेषित करने का मार्ग आसन हो जायेगा.
,   व्यंग्य के क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति न होने के सवाल पर श्री चंदर ने रायपुर की डा. स्नेहलता उपाध्याय का जिक्र करते हुए कहा कि जिस तरह पुरुष व्यंग्यकारों ने आगे आकर अपने को तपाया गलाया है उसी तरह महिलाओं में से भी कुछ को आगे आकर अपने आकलन का एक ढांचा तैयार करना होगा. गोष्ठी के संचालक डा. महेंद्र कुमार ठाकुर के व्यंग्य कविताओं को गद्य जैसी पहचान न मिल पाने के दर्द पर उनका कहना था कि इस बात का ध्यान रखना होगा कि व्यंग्य कविता सस्ती मंचीय या वाचिक परंपरा बन कर न रह जाये. अखबारों में छप रहे व्यंग्य कालमों पर उन्होंने कहा कि अख़बार की नीतियों और शब्दों की सीमा में बंधा व्यंग्य कालजयी नहीं हो सकता. इसके साथ ही उन्होंने व्यंग्य लेखकों को सलाह दी कि संवेदना की धरती को बौद्धिकता के सांड से बचाने की जरूरत है. हम ऐसा नहीं कर पाए तो व्यंग्य आपको अगली पीढ़ी तक नहीं ले जा पायेगा.
,   महोत्सव के मुख्य अतिथि दिल्ली से पधारे श्रवण कुमार उर्मलिया ने इस अवसर पर जोर देकर कहा कि व्यंग्य के मानक स्थापित होने ही चाहिए और यह एक चुनौती है. इससे आलोचक का काम आसान हो जायेगा. डा. स्नेहलता पाठक ने विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि वो चालीस साल से लेखन कर रहीं हैं पर मंच उन्हें पहली बार मिला है. ये महिला व्यंग्य लेखिकाओं का एक दर्द है. व्यंग्य साहित्य की ही एक विधा है और सामजिक परिस्थितियों के हिसाब से व्यंग्य बदलता है. पर व्यंग्य लेखन ऐसा हो जो वैमनस्यता न फैलाये, विषमता को दूर करे. व्यंग्य का उद्देश्य सामजिक कल्याण होना चाहिए. तात्कालिक लेखन के बजाय कालजयी लेखन पर ध्यान देना होगा. व्यंग्य लेखन की जमीन बहुत बड़ी है और कलम के सामने तमाम चुनौतियाँ हैं.
,   इस के पहले विषय प्रवर्तन प्रतिष्ठित व्यंग्यकार विनोद साव ने किया और कई प्रतिष्ठित व्यंग्यकारों ने अपने विचार सामने रखे. विनोद साव ने कहा कि व्यंग्य में प्रतिपक्ष की तरह मूल्यों की स्थापना होनी चाहिए. स्वातंत्र्योत्तर काल में श्रीलाल शुक्ल, शंकर पुणताम्बेकर, शरद जोशी, लतीफ़ घोंघी, रविन्द्रनाथ त्यागी, ज्ञान चतुर्वेदी, प्रेम जन्मेजय ने व्यंग्य में गहरी पैठ बनायी. आज भी प्रकाशक कह रहे हैं कि वो व्यंग्य सबसे ज्यादा छाप रहे हैं. लेखक आधा खर्चा भी दें तो वो छाप ले रहे हैं. व्यंग्य कविता के क्षेत्र में ऐसा नहीं है. लोकप्रियता के खतरे हम देख रहे हैं. लाफ्टर शो में पठनीयता पर जोर है लोकप्रियता पर नहीं. ऐसे में व्यंग्य पर आयोजित गोष्ठियों को पिकनिक मान लेना भूल होगी. समारोह में उपस्थित व्यंग्यकारों से जिन बिन्दुओं पर चर्चा का आह्वान किया उनमें व्यंग्य विधा है कि नहीं, है तो उसमें किन किन बातों का समावेश होना चाहिए. व्यंग्य क्या किसी निश्चित ढांचे में रहना चाहिए जैसे कहानी, निबंध आदि का होता है. व्यंग्य में हास्य कितना हो या बिलकुल न हो.
,   रायपुर के ही गिरीश पंकज ने कहा कि आज़ादी के बाद जैसे जैसे मोहभंग हुआ व्यंग्य और मुखरित होता गया है. आज़ादी के पहले देश को समझने के लिए जैसे प्रेमचंद को पढना काफी होता था उसी तरह आज़ादी के बाद के भारत को परसाई जी के व्यंग्य लेखन से समझा जा सकता है. 61 वर्ष की आयु में 61 किताबों की रचना कर चुके पंकज का सुभाष चंदर की राय से अलग कहना था कि व्यंग्य के मानक तय करना कठिन है. व्यंग्य का ढांचा ही पर्याप्त है. जो रचना पाठ के साथ व्यंग्य का आभास कराती जाए वो परसाई के शब्दों में शैली है तो श्रीलाल शुक्ल के अनुसार भंगिमा है. व्यंग्य प्रतिपक्ष की आवाज़ है और जनता के साथ खड़ी विधा है. अन्याय के खिलाफ व्यंग्य सीधे सीधे हस्तक्षेप करता है. बहुत सी रचनाएँ राजसत्ता को सोचने पर मजबूर करतीं हैं.
,   लखनऊ से आये व्यंग्यकार राजेंद्र वर्मा ने कहा कि वो निबंध जो ललित निबंध न हो, टिप्पणियों में व्यंग्य कहलायेगा. व्यंग्य का ढांचा तय हो तब तो विधा तय हो पाए. किताबें पाठकों तक पहुँचती ही नहीं. दस सालों में लिखे व्यंग्य को पढ़ें और मिल कर समझें तो नए लेखों के लिए दिशा तय की जा सकती है. उनका यह भी कहना था कि व्यंग्य के क्षेत्र में आज 90 प्रतिशत राजनीति पर लिखा जा रहा है केवल दस प्रतिशत स्पेस सामजिक सरोकारों के लिए बचता है. आज व्यंग्य जो पढ़े या लिखे जा रहे हैं उनमे विस्तार बहुत अनावश्यक है. व्यंग्य का कलेवर लघु हो और रचना की कसावट ऐसी हो जो पहली या दूसरी ही पंक्ति से व्यंग्य का आभास कराये. लखनऊ से ही आये रजनीकांत वशिष्ठ ने व्यंग्य लेखन में तकनीक के विस्तार का लाभ उठाने का सुझाव दिया ताकि प्रिंट की निर्भरता से हट कर व्यंग्य लेखन दृश्य श्रव्य माध्यमों पर अपनी धारदार पकड़ बना सके.
,   दिल्ली से आये रामकिशोर उपाध्याय ने भी व्यंग्य लेखन पर बाजारवाद के असर पर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि व्यंग्य का सबसे महत्वपूर्ण मानक यदि कोई है तो वो है उसकी सम्प्रेषण शक्ति. महत्वपूर्ण यह है कि सशक्त व्यंग्य की प्रहारक क्षमता, शैली, शिल्प कैसा हो इसके बारे में सत्रहवीं शताब्दी के अंग्रेज साहित्यकार जोसेफ हाल ने अपनी एक कविता में कहा है कि व्यंग्य साही की तरह होना चाहिए जिसके तीखे. नुकीले कांटे हर शब्द में गोली की तरह घातक हों जिसको चुपचाप सुन कर और पढ़ कर सुकोमल शर्मीले कपोलों और आँखों से भी खून टपकने लगे. भारत में कबीर ने अपनी लेखनी से समाज को झकझोरा. सच्चा व्यंग्यकार ठकुरसुहाती का मुंहताज नहीं होता.
,   सवाई माधोपुर से आये प्रभाशंकर उपाध्याय भी व्यंग्य लेखन में मानकों की स्थापना के खिलाफ खड़े नज़र आये. उनका कहना था कि व्यंग्य का कोई मानक या पैमाना नहीं हो सकता. यह स्वतः स्फूर्त है. किसी फार्मूले से मौलिकता समाप्त होने के खतरे हैं. 30 वर्ष पहले पुस्तकालय, काफी हाउस भरे रहते थे अब प्रकाशक छाप कर मरा जा रहा है, साहित्य बिकता नहीं. समाज में जो चीजें ढकीं थीं सामने आ गयी हैं. भ्रष्टाचार को सामाजिक मान्यता मिल गयी तो किसी शक्तिशाली को व्यंग्य का पात्र बना पाना मुश्किल हो गया है. दिल्ली के प्रमोद कौशिक, भिलाई के रवि श्रीवास्तव, रायपुर के के पी सक्सेना दूसरे, अनिल आयन श्रीवास्तव, अरुण अर्णव खरे, राजेश्वर आनदेव, गोवर्धन यादव, रश्मि श्रीवास्तव, रामेश्वर वैष्णव, श्रीमती अरुणा श्रीवास्तव ने भी अपने विचार रखे या रचनाओं का पाठ किया. तो सञ्चालन की बागडोर पहले सत्र में संभाली रायपुर के नामचीन व्यंग्यकार डा. महेंद्र कुमार ठाकुर ने और दूसरे सत्र में के पी सक्सेना दूसरे ने. दूसरे सत्र में व्यंग्य पाठ महेंद्र ठाकुर, विनोद सॉव, गिरीश पंकज, सुशील यादव, राजशेखर चौबे, स्नेहलता पाठक, रवि श्रीवास्तव, रामकिशोर उपाध्याय, प्रभाशंकर उपाध्याय, के पी सक्सेना दूसरे, राजेन्द्र वर्मा, अरुण अर्णव खरे, उर्मिलिया, सुभाष चन्दर आदि ने किया.
,   माध्यम के महासचिव अनूप श्रीवास्तव का कहना था कि आज व्यंग्य की त्रासदी ये है कि उसे उसकी लोकप्रियता ही मार रही है. हर विधा में व्यंग्य को छौंका जा रहा है. लिखने की मजबूरी हमसे टिप्पणियां लिखवा रही है घटनाओं पर व्यंग्य नहीं. शायद व्यंग्य परसाई की पाठशाला और शरद जोशी के मठ से बाहर नहीं निकल पा रहा है. शायद इसी वजह से व्यंग्य एक फार्मूले पर स्थित होता जा रहा है. एक फ्रेम में बंधता जा रहा है. एक नाव से आखिर कितनी बार यात्रा की जा सकती है. व्यंग्य को अपनी नयी लीक बनानी होगो नए प्रयोग करने होंगे. शैली की नयी भंगिमा ढूंढनी होगी. व्यंग्य के पोखर में जिस तेजी से पानी डाला जा रहा है उससे हम व्यंग्यकारों को बचना होगा.
,   इस अवसर पर माध्यम साहित्यिक संस्थान की मासिक व्यंग्य पत्रिका अट्टहास के छत्तीसगढ़ विशेषांक का विमोचन किया गया. इसके साथ ही राजेन्द्र वर्मा की सत्ता रस, रंदी सत्यनारायण राव की दो पुस्तकों और उमाशंकर मनमौजी की किताब रामकुमार वर्मा के नाटकों में हास्य व्यंग्य, अविनाश बागडे की जमूरों की जम्हूरियत का लोकार्पण भी किया गया. माता कौशल्या ज्योतिष साहित्य संस्कृति शोधपीठ छत्तीसगढ़ एवम संजीवनी फाउंडेशन रायपुर द्वारा प्रख्यात व्यंग्यकार व आलोचक सुभाष चन्दर को व्यंग्य सम्राट का मानद अलंकरण तथा अनूप श्रीवास्तव, माध्यम के महासचिव को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रदान किया गया. संजीवनी फाउंडेशन के अध्यक्ष राजशेखर चौबे ने बताया कि राष्ट्रीय स्तर के व्यंग्य महोत्सव का आयोजन छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पहली बार हुआ है. इस महोत्सव का मुख्य उद्देश्य छत्तीसगढ़ के युवा व्यंग्यकारों को मंच प्रदान करके सामने लाना है. इस अवसर पर लतीफ़ घोंघी, प्रभाकर चौबे, विनोदशंकर शुक्ल और गजेन्द्र तिवारी को श्रद्धांजलि दी गयी.
,   महोत्सव में स्थानीय रचनाकारों में सर्वश्री संजीव ठाकुर, सुशील यादव, सुधीर शर्मा, रामेश्वर वैष्णव, श्रीमती अरुणा चौहान, उमा तिवारी, मंजुला श्रीवास्तव, शकुंतला तिवारी, राजेश जैन राही, नरेश दुबे नवनीत, अमरनाथ त्यागी, रामकुमार बेहार, अरुण निगम, सूर्यकान्त गुप्ता, महेन्द्रपाल सिंह भाटिया, सुबोध साव, चंद्रभूषण कसेर, अशोक तिवारी, राजेश अग्रवाल, प्रशांत काले, सी के साहू, राजेश चन्द्र दीवान, जवाहरलाल तिरहुती आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही. अंत में संजीवनी फाउंडेशन रायपुर के अध्यक्ष राजशेखर चौबे ने सभी उपस्थित अथितियों का व विप्र भवन के पदाधिकारियों विशेषकर श्री ज्ञानेश शर्मा का सहयोग के लिए धन्यवाद दिया.
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,   रायपुर व्यंग्य महोत्सव के एक दिन पहले भिलाई में पन्नालाल पदुमलाल बक्षी सृजन पीठ में भी व्यंग्य की चुनौतियों पर ज्ञान पीठ के अध्यक्ष और इतिहासकार आचार्य रामेन्द्र मिश्र की अध्यक्षता में एक लघु किन्तु गरिमामय गोष्ठी का आयोजन किया गया. इसमें अनूप श्रीवास्तव, रामकिशोर उपाध्याय, राजेंद्र वर्मा, गिरीश पंकज, रवि श्रीवास्तव और रजनीकांत वशिष्ठ ने वर्तमान परिदृश्य में व्यंग्य की चुनौतियों पर सारगर्भित विचार सामने रखे. इस अवसर पर सभी वक्ताओं को बक्षी जी की पुस्तकें, और श्रीफल देकर सम्मानित किया गया. उसी शाम को रायपुर में एक कॉलेज में अखिल भारतीय कायस्थ महासभा ने पत्रकार और व्यंग्यकार अनूप श्रीवास्तव के सम्मान में एक आयोजन रखा जिसमे अनूप जी ने अपनी राचन यात्रा के संस्मरण प्रस्तुत किये. महासभा के मुखिया शंकरलाल श्रीवास्तव ने इस अवसर पर अनूप जी का शाल और पुस्तकें देकर सम्मान किया.
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