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विरासतों का निर्माण बाकी है

udaybhoomi 5/12/2018/span> Technology

विकल्प शर्मा : नयी दिल्ली : 2013 में नरेन्द्र दामोदर दास मोदी का जिस तरह से गुजरात से दिल्ली आगमन हुआ था, मोदी लोगों के दिमाग के साथ दिलों पर भी राज करने लगे. शायद उसके शिखर संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को लगने लगा कि मोदी का कद इस शिखर संगठन से ऊपर जा रहा है या मोदी के सामने संघ का आकार सिकुड़ता जा रहा है. संघ के अन्दर मोदी के कई विरोधी तैयार किये गये लेकिन उनमें से कोई भी आक्रामक तेवर के साथ सामने नहीं आया बल्कि हमले पीछे से किये गये. 2014 में सरकार के बनने के बाद इनमें से एक ने मोदी से हाथ मिलाया लेकिन जब मोदी उनकी लालसा को आगे नहीं बढा सके तो वह अन्दर ही अन्दर हमले करने लगे. इसी दौरान एक दूसरे बड़े संघ के अधिकारी मोदी के सुरक्षा कवच बन कर उमड़े. संघ प्रमुख मोहन भागवत यह सब तमाशा देख मौन रहते हुए मुस्कुरा भर रहे थे.
,   इसी बीच 2017 में उत्तर प्रदेश विधान सभा के चुनाव हुए और भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला. मोदी-शाह के न चाहते हुए भी संघ ने उत्तर प्रदेश में एक योगी को सत्ता सौंपी तो वहाँ के विधायकों का सीधा सा सवाल था क्या हमने इस योगी के लिए उत्तर प्रदेश को तैयार किया. यह सारे प्रश्न आज उत्तर दे रहे हैं. प्रशासनिक अक्षमता के कारण यह सन्त पूरी तरह से फेल होते नजर आ रहे हैं और पुलिस और अफसर शाही में एक अजीब सा विद्रोह नजर आ रहा है. अब काम तो कुछ है नहीं तो रामलीला मैदान और मर्यादा पुरुषोत्तम राम की मूर्ति ही बनाई जाए. फिर संघ के एक बड़े अधिकारी के माध्यम से मोदी पर बड़ा हमला कुछ सवाल जरूर खडे करता है कि पटेल की मूर्ति बन सकती है तो राम मन्दिर क्यों नहीं. कहीं इस हमले में मोदी उस अधिकारी के पीछे से योगी तो नहीं झाँक रहे हैं.
,   पुरी के जगन्नाथ मन्दिर के गर्भ गृह में प्रवेश और निकास द्वार के पास मरीजों को ले जाने वाले स्ट्रेचर को देखकर अचरज होना लाजिमी है. लेकिन किसी भीड़ भरे मन्दिर में कुछ वक्त बिताए तो इसका इस्तेमाल दिख जाएगा. हमारे इस संत के मुख्यमंत्री के राज में अस्पतालों की ऐम्बुलेंस नहीं चल पा रही है तो मन्दिरों में योजना तो बिल्कुल बेकार लगेगी. चलिए खैर पुरी की बात करते हैं यहाँ मन्दिर के गर्भ गृह में भारी भीड़ और अंधेरे में दम घुटना आम बात है भीड़ भाड़ के दिनों में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं. अगर जगन्नाथ मन्दिर को भक्तों के लिए निरापद और संविधानिक बनाने का अभियान चलाया जाये तो क्या उसके समर्थन में वही भावनात्मक बुखार उमड़ेगा जो किसी दूसरे मन्दिर बनाओ अभियान मे उबाला जाता है. जगन्नाथ मन्दिर ही क्यों देश के किसी भी पुराने मन्दिर, तीर्थ या विरासत को सहेजने संवारने में राजनैतिक मूर्ति निर्माण जैसी दीवानगी नहीं दिखती. नई विरासतों की सियासत पर लहालोट होने वाले हम लोग नये मन्दिरों के लिए लड़ते मरते हैं और पुराने मन्दिरों की भीड़ में दब कुचलकर मर जाते हैं.
,   पुरातन संस्कृति की उपेक्षा पर फट पड़ने वाला भारतीय दक्षिणपंथ भई विरासतों के दुर्दिन तो दूर नहीं कर सका बल्कि कुछ उल्टा ही कर दिया. इस साल जनवरी में लोकसभा ने प्राचीन स्मारक पुरातात्विक विरासत कानून को संशोधित करते हुए प्राचीन स्मारकों के पास 100 मीटर तक निर्माण न करने की शर्त हटा दी. बावजूद इसके 2016 में सरकार ने लोकसभा को बताया था कि पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण के तहत आने वाले स्मारक गायब हो गये हैं. इसमें मन्दिर और प्रस्तर अभिलेख भी शामिल हैं. कानून बदलने के बाद स्मारकों को ढहाने की छूट सी मिल गई है.
,   हमारे पुराने तीर्थ मन्दिरों में अव्यवस्था का अंबार है. कुछेक आधुनिक मन्दिरों को छोड़कर अधिकांश मन्दिर नगरों के बीच या फिर दुर्गम स्थलों पर हैं और हादसों की बाट जोहते हैं. नियमों से लदे फँसे इस देश में प्राचीन स्थापित और पूजित मन्दिरों के प्रबन्धों को लेकर नीतियाँ व्यवस्थाएं नहीं बन सकी. नये मन्दिर बनाने के लिए संसद को हिलाने की तैयारी आये दिन होती है. हम मन्दिरों में महिलाओ को रोकने की आस्था पर हमला बता सकते हैं. मन्दिर की अवस्वस्था से मरने वाले भक्तों पर हमें तरस नहीं आता.
,   गर्व करते रहिए कि हमारे पास दुनिया के सबसे पुराने मन्दिर हैं उन मन्दिरों के पास अकूत खजाना है. या हमारे पास दुनिया की सर्वाधिक विरासतें हैं लेकिन 71 साल में केवल 15000 स्मारकों को कानूनी संरक्षण हैं जबकि ब्रिटेन में यह संख्या 60000 है. न हमारी आस्थाएं निरापद हैं और न ही विरासतें सुरक्षित क्योंकि हमारे रहनुमा न तो पुराने मन्दिरों की शांति व सुविधा के साथ पूजा के लायक बनाना चाहते हैं और न अतीत के गौरव को सजाना संवारना. ऐसा करने से इतिहास पर गर्व होगा.
,   राजनीति को ऐसी विरासतें बनानी है जिस पर हमेशा लड़ते रह सकें. भारत की राजनीति ही उसकी विरासत के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है.
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