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कांगेस का संक्रमण काल

udaybhoomi 20/12/2018/span> Technology

विकल्प शर्मा : नयी दिल्ली : कांग्रेस का संक्रमण और संकट काल अब शुरू होता है. अब तीनों राज्यों में बड़ी जीत हासिल करने के बाद किसानों के कर्ज माफी से जूझना एक बड़ा संक्रमण काल है. प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ जिन अम्बानी बन्धुओं की ओर आस लगाए हुए है उन्हें कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी बेईमान और चोर कहकर उनका उपहास उड़ा चुके हैं. इससे भी बड़ा सवाल यह है कि इन तीन राज्यों से बाहर कांग्रेस के पास क्या है. कांग्रेस या तो किसानों को ठग रही है या स्वंय अपने को छला महसूस कर रही है. दूसरी ओर 1984 के दंगों के आरोपी सज्जन कुमार को उम्रकैद सजा का फैसला ऐसे समय में आया जब तीनों राज्य के मुख्यमंत्री अपने पद की शपथ ले रहे थे. लगता है आगे आने वाला समय कांग्रेस के लिए किसी संक्रमण काल से कम नही होगा.
,   जॅार्ज एस पैटन ने कहा था कि बिल्कुल रसातल में पहुंचने के बाद आप पलटकर कितना ऊपर जाते है वही कामयाबी है. एक साल पहले राहुल गांधी ने जब बतौर अध्यक्ष कांग्रेस की कमान संभाली थी, तब खुद उनकी और उनकी पार्टी की किस्मत रसातल में पहुंच चुकी थी. नरेंद्र मोदी-अमित शाह का काफिला तुफानी गर्जना के साथ आगे बढ़ रहा था और 29 में से 18 राज्यों मे भारतीय जनता पार्टी का परचम लहरा रहा था. दूसरी तरफ बदतरीन प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस ने 44 सीटें हासिल की थी, एक के बाद एक राज्य विधानसभाओं से भी उसकी सरकारें लगातार बेदखल होती जा रही थी, इनमें महाराष्ट्र, हरियाण, हिमांचल प्रदेश, असम, उत्तराखण्ड, केरल, मणिपुर और मेघालय शामिल थे, व गुजरात में भाजपा को अपनी लगातार छठी जीत दर्ज करने से रोकने में भी नाकाम रही थी. पंजाब और कर्नाटक अकेले दो बड़े राज्य थे जहां उसने चुनाव जीते थे और इनमें भी कर्नाटक में वह चुनाव बाद गठबंधन के सहारे सत्ता में आ सकी थी.
,   साल भर बाद कांग्रेज ने पलटकर पूरी ताकत से वापसी की और उसने हिंदी पट्टी के तीन बेहद अहम राज्यों-मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़-में सत्ता पर कब्जा कर लिया है, तीन राज्यों की इस जीत ने देश की सबसे पुरानी पार्टी में नाटकीय ढंग से नई जान फूंक दी है और उसे सियासी ताकत में तब्दील कर दिया है. इस जीत ने 2019 के आम चुनाव में नरेन्द्र मोदी के अव्वल चैलेंजर के तौर पर राहुल का कद ऊंचा कर दिया है. इस जीत ने मोदी-शाह की जोड़ी से उनका अपराजेयता का आभामंडल छीन लिया है और भाजपा को गहरे आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया है. इससे ज्यादा अहम बात यह कि इस जीत ने प्रधानमंत्री में तौर पर मोदी के दोबारा चुनकर आने पर सवालिया निशान लगा दिया है. अब यह उतना पक्का नही रह गया है जितना एक साल पहले मालूम देता था. 2019 के खेल का मैदान खुल गया है.
,   आखिरकार राहुल गांधी का आगमन हो चुका है नेतृत्व कांग्रेस के अनिच्छुक उत्तराधिकारी से एक नेता के तौर पर परिपक्व हो चुके हैं जो पार्टी की नाक में दम करने वाले अंतर्विरोधों को संभाल सकता है. पुराने नेताओं ओर युवा तुर्को को एकजुट टीम के तौर पर साथ ला सकता है जैसा कि उन्होनें मध्यप्रदेश और राजस्थान में किया, जमीनी स्तर पर कांग्रेज कार्यकताओं में नई जान फूंक सकता है. मतदाताओं के लिए भरोसेमंद सियासी अफसाना बुन सकता है अपने विरोधियों और खासकर मोदी को उन्ही की भाषा और तौर-तरीकों से तुर्शी-व-तुर्शी जवाब दे सकता है और सियासी लड़ाई की गरमागरमेी से शालीनता और भद्रता बनाए रख सकता है. राहुल ने दिखा दिया है कि शालीन राजनीति कोई विरोधाभासी लफ्ज नही है. उन्होने जीत के उछाल में वह जाने से परहेज किया, जब चुनाव नतीजों की घोषणा के बाद उन्होने प्रेस से कहा,‘‘भाजपा के मुख्यमंत्रियों ने अपने पिछले कार्यकाल में जो काम किए, उनके लिए मैं उनका शुक्रिया अदा करना चाहूंगा. हम उनसे कमान अपने हाथ में लेंगे और शानदार काम करेगें.’’
,   प्रेस कान्फ्रेन्स करके भी राहुल ने यह बात जाहिर कर दी कि उनका काम करने का तरीका मोदी की कार्यशैली से अलग है. जब भाजपा चुनाव जीतती है तो मोदी पार्टी मुख्यालय में पहुंच जाते है, जहां धूमधाम से उनका अभिनंदन किया जाता है और फिर वे मीडिया के सवाल किए बगैर पार्टी कार्यकताओं को संबोधित करते हैं. इसके उलट राहुल अपने कमजोर और नाजुक पहलू को लोगों के सामने रखने के लिए तैयार थे. जब उन्होने कहा, ‘‘कल मैं अपनी माँ से बात कर रहा था और उन्हे बता रहा था कि 2014 के चुनाव मेरे लिए निहायत सबसे अच्छा मौका थे मैनें काफी सीखा कि चीजों के बारे में कैसे सोचा जाए मैनें सीखा कि सबसे अहम बात है कि देश के लोग क्या महसूस कर रहे है और उसी भावना के साथ काम करना होता है’’ फिर निर्णायक प्रहार करते हुए उन्होने आखिर में कहा ‘‘ साफ कहूं तो मोदी ने ही मुझे वह सबक सिखाया, क्योंकि मैने समझा कि क्या नही करना है मुझे उनके बारे में बुरा लग रहा है बावजूद इसके कि मै विपक्ष में हूं कि उन्होने देश की धड़कन को सुनने से इनकार कर दिया’’
,   राहुल जानते है कि जहां इन राज्यों की जीत ने कांग्रेस का हौसला बहुत बढ़ा दिया है. वहीं पार्टी भाजपा की ताकत का मुकाबला करने और 2019 के चुनाव से उसे धूल चटाने के लिए तैयार होने से अभी दूर है. मुश्किल से आधा दर्जन राज्यों को छोड़ दें, तो पार्टी कहीं भी उस तरह बड़ी खिलाड़ी नही है जैसे वह पहले थी. यहाँ तक कि जिन राज्यों में वह मुख्य विपक्ष है वहां भी असंगठित और बदहाल है. मसलन, हरियाणा में राहुल पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा के विरोध के बावजूद नौजवान नेता अशोक तंवर को आगे बढ़ा रहे हैं. उन्होने तंवर को राज्य कांग्रेज प्रमुख के ओहदे से हटाने का प्रतिरोध किया यहां कि तब भी जब हुड्डा के समर्थक विधायकों ने इसके लिए लिखित प्रस्ताव दिया, राहुल को अब इस कमजोर करने वाले टकराव का संतोषजनक समाधान निकालना होगा. उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में युवा नेताओं को कमान सौंपकर राज्य इकाईयों में नई जान फूंकने की जरूरत है.
,   महाराष्ट्र सरीखे बडे़ राज्य में कांग्रेस पिछले दो साल में 24 में से एक भी नगर निगम में जीत दर्ज नही कर सकी. महज एक नांदेड़ को छोड़कर, जो वैसे भी राज्य अध्यक्ष अशोक चव्हाण का गृह नगर है. अगर उसे सितंबर 2019 में राज्य के विधानसभा चुनाव जीतने हैं तो साफ तौर पर यहां नेतृत्व बदलने की जरूरत है. लोकसभा के लिए वह शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेज पार्टी (राकांपा) के साथ सीटों के बंटवारे पर चतुराई से सहमत हो गई, जिसमें उसें 48 में से 40 लोकसभा सीटें मिलेंगी. राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में -जहां कुल मिलाकर लोकसभा की 65 सीटें है-विधान सभा चुनावों में मिली फतह के बाद पार्टी के प्रदर्शन में सुधार की संभावना है. मगर गुजरात, असम, केरल, कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश में-जहां कुल 120 लोकसभा सीटें है राहुल को पार्टी मे नई ऊर्जा फूंकने की दरकार है.
,   कांग्रेस के साथ दिक्कत यह है कि दूसरे बड़े राज्यों में वह तीसरे या उससे भी नीचे के नंबर की खिलाड़ी बनकर रह गई है. पश्चिम बंगाल में जो 42 सांसद लोकसभा में भेजता है, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस का अब भी अच्छा-खासा असर है. माकपा और कांग्रेस दोनो को पीछे धकेलकर भाजपा उनकी मुख्य चैलेंजर के तौर पर उभर आई है. ओडिशा (21 सीटे) में बीजू जनता दल (बीजद) के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का दबदबा कायम है और यहां भी कांग्रेस को तीसरे स्थान पर धकेलकर भाजपा मुख्य चैलेंजर बनकर उभर रही है.
,   उत्तर प्रदेश में जो उसके ज्यादा 80 की तादाद में सांसद लोकसभा में भेजता है कांग्रेज हाशिये की खिलाड़ी बनी हुई है. मौजूदा लोकसभा में राज्य से उसके पास महज दो सीटें है और उत्तर प्रदेश विधानसभा की 404 सीटों में महज सात उसके पास हैं. हिन्दी पट्टी के राज्यों की इस जीत ने जहां पार्टी की राज्य इकाई में जोशो-खरोश भर दिया है. उसे दोनों मुख्य विरोधी पार्टियों-समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ सीटों के संतोषजनक बंटवारे का रास्ता निकालना होगा. ताजा विधानसभा चुनावों मे कांग्रेस इन दोनो पार्टियों के साथ गठबंधन करने में नाकाम रही.
,   बिहार में जहां लोकसभा की 40 सीटें है कांग्रेस संगठन की कमजोरियों से लाचार है जबकि उसके गठबंधन की सहयोगी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) अपने समर्थन आधार को मजबूत करने की चुनौती से जूझ रहा है. उसके करिश्माई नेता लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले के मामलों में जेल की सजा काट रहे हैं. उनके बेटे तेजस्वी की मातहती में राजद ने इस साल मार्च और मई में क्रमशः एक लोकसभा सीट और दो विधान सभा सीटें जीतकर नई ताकत से उठ खडे़ होने का संकेत दिया है. मगर भाजपा अपने गठबंधन सहयोगी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुआई वाले जनता दल-यूनाइटेड के साथ सीटों के बंटवारे का रास्ता पहले ही निकालकर खेल में आगे हो गई है.
,   राहुल को अच्छी तरह पता है कि अगर उन्हें 2019 में मोदी और भाजपा को धराशायी करना है, तो कांग्रेस अकेले चुनाव में नहीं उतर सकती और उसे विपक्ष के महागठबंधन का हिस्सा बनना ही होगा. इस अनिवार्यता को समझते हुए वे अपनी नेतृत्व शैली में बदलाव लाए हैं. 2019 की खातिर संभावित सहयोगी दलों तक पहुंचने के लिए अतिरिक्त जतन करने के लिए भी तैयार हैं. राहुल सियासी मशविरे के लिए अक्सर दिल्ली में शरद पवार के घर चले जाते हैं. माकपा नेता सीताराम येचुरी राहुल के दूसरे सियासी सलाहकार के तौर पर उभरे हैं. दक्षिण में द्रमुक के स्तालिन की शक्ल में उनके पास एक टिकाऊ समर्थक है.
,   राहुल के लिए हाल के वक्त में सबसे बड़ी कामयाबी टीडीपी के मुखिया चंद्रबाबू नायडू के साथ उनकी दोस्ती है, जो विपक्षी एकता की धुरी के तौर पर सामने आए हैं. कांग्रेस के कई शीर्ष नेताओं ने राहुल को तेलगांना में टीडीपी के साथ गठबंधन करने के खिलाफ सलाह दी थी क्योंकि इससे राज्य में पार्टी को नुक्सान पहुंचने की संभावना थी. मगर कांग्रेस अध्यक्ष ने लोकसभा चुनाव के लिए बेहतर मोलभाव की खातिर तेलगांना में आधी-अधूरी संभावनाओं का बलिदान करने का फैसला किया. इसलिए टीआरएस ने कांग्रेस-टीडीपी गठबंधन को भले ही धूल चटा दी हो, पर राहुल के पास फिर भी मुस्कराने की वजह है. 10 दिसम्बर को नायडू ने खुद पहल की और 21 विपक्षी पार्टियों के नेताओं को दिल्ली में मिलने के लिए जुटाया. ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल सरीखे नेता भी बैठक में शामिल हुए, जो पहले कांग्रेस की बुलाई ऐसी बैठकों से दूर रहे थे. ममता बनर्जी ने ट्वीट किया-‘‘सेमीफाइनल ने साबित कर दिया है कि भाजपा इन राज्यों में कहीं नहीं है. यह 2019 के फाइनल मैच का असली लोकतांत्रिक संकेत है. आखिरकार लोग ही लोकतंत्र में ‘मैन आफ द मैच’होते हैं. विजेताओ को मेरी बधाई.’’सपा और बसपा ने भी मध्य प्रदेश में कांग्रेस को बिना शर्त समर्थन देने में देर नहीं लगाई, बावजूद इसके कि पार्टी ने चुनाव से पहले उनकी पेशकशों को ठुकरा दिया था.
,   राहुल के लिए अब चुनौती यह है कि वे इस एकता को 2019 के लोकसभा चुनाव तक आगे ले जाएं और उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में रणनीतिक गठबंधन कायम करें, जहां कुल मिलाकर 270 लोकसभा सीटें हैं. दक्षिण में तेलगांना (17 सीटें) में तो संभावनाएं धुंधली नजर आती है, लेकिन कर्नाटक (28 सीटें) में, जहां जे0डी0एस0 के साथ उसका गठबंधन है, कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद कर रही है. तमिलनाडु (39 सींटे) में उसने द्रमुक के साथ हाथ मिलाया है, आंध्र प्रदेश (25 सीटें) में सत्तारूढ़ टीडीपी के साथ सीटों का बंटवारा किया है और पुदुच्चेरी की इकलौती लोकसभा सीट के अलावा केरल (20 सीटें) में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के हिस्से के तौर पर गठबंधन के अच्छे तौर-तरीके अपनाए है. इस तरह दक्षिण में लोकसभा सीटों की कुल तादाद 130 पर पहुंच जाती है.
,   मुद्दों से निपटने के मोदी सरकार के तौर-तरीकों में महज गलतियां ढूंढने के बजाए राहुल को एक वैकल्पिक विजन सामने रखना होगा. चुनाव नतीजों के बाद प्रेस कान्फ्रेंस में उन्होंने देश के सामने मौजूद प्रमुख मुद्दों का खाका पेश किया और कहा कि आज मुख्य मुद्दे हैं. नौजवानो को रोजगार मुहैया करवाना, देश में किसानों का भविष्य पक्का करना और भ्रष्टाचार पर लगाम कसना. अब जब कांग्रेस बड़े राज्यों में सत्ता में लौट आई है, उसे कृषि के संकट का हल निकालने के तरीके खोजने होंगे और, जैसा कि खुद राहुल ने माना है, कर्ज माफी के जरिए नहीं, जो इसका अस्थायी समाधान है. चुनौती यह होगी कि वाजिब ढांचागत सुधार विकसित किए जाएं और वे भी बहुत कम वक्त में, क्योंकि हिंदुस्तानी वोटर अब खासा अधीर और बेसब्र है. राहुल ने ईमानदारी से यह स्वीकार किया कि ‘‘मौजूदा हुकूमत पर हमले करने के बजाए हम ढांचे कायम करेंगे और नए विजन खड़ा करेंगे, जो हमारे देश को आगे ले जा सके।’’पार्टी प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि पिछले कई महीनों से बड़ी तादाद में अलग-अलग तबकों से बातचीत की कोशिश चल रही है ताकि पार्टी के लिए एक विजन विकसित किया जा सके.
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