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क्या एमजीआर के रास्ते पर हैं रजनीकांत

udaybhoomi 27/12/2018/span> Technology

क्या एमजीआर के रास्ते पर हैं रजनीकांत
,  विकल्प शर्मा : नयी दिल्ली : रजनीकांत राजनीति में उतरने की लालसा लम्बे समय से पाल रहे हैं लेकिन दिसम्बर 2917 में मुख्यमंत्री जयललिता की मृत्यु के बाद ही उन्होंने महसूस किया कि नेतृत्व शून्यता को भरने का समय आ गया है. तब जयललिता के प्रतिद्वंद्वी द्रमुक के दिग्गज एम करुणानिधि की भी मृत्यु हो गयी. ऐसे में रजनीकांत ने राजनीति में उतरने के अपने इरादे का खुलासा करके भारी खलबली मचा दी.
,   तमिलनाडु की राजनीति में 1967 से ही दो द्रविड़ पार्टियों-अन्नाद्रमुक और द्रमुक का दबदबा रहा. जयललिता ने 2011 और 2016 में दो चुनाव जीत कर अपना दबदबा बनाये रखा. अहम बात ये है कि बीते एक दशक के दौरान ऐसे तमाम गठबंधन जिनकी अगुवाई न तो अन्नाद्रमुक कर रही थी और न ही द्रमुक, सियासी फलक से गायब हो गये और ये साफ हो गया कि उनका कोई वोट बैंक नहीं है. सियासी ताकत के तौर पर उभरने के लिये रजनीकांत को उन वोटों के हिस्सों पर उभरना होगा जो इन दोनों द्रविड़ पार्टियों के पास हैं. रुपहले परदे के इस सितारे ने इस बीच बिना डंका बजाये ही रजनी मक्कल मुंडलम के अपने नेटवर्क में नई जान फूंकने और जमीनी स्तर पर सियासी कार्यकर्ताओं और नेताओं का काडर बनाने पर खासा ध्यान दिया है. यही संगठन उनकी बुनियाद रहा है. इनमें उनके कुछ कटटर समर्थक हैं तो 1986 के दशक से ही खून और आंखों की पुतली को बढ़ावा देने के लिये चलाये गये अभियान में उनके साथ जुड़े हैं.
,   रजनीकांत हालांकि ऐहतियात जरूर बरत रहे हैं कि उनके उपर भाजपा समर्थक होने का आरोप न लगे और अल्पसंख्यक वोट खोने का जोखिम भी न उठाना पड़े. उनकी शुरुआती जिंदगी में रामकृष्ण मिशन और स्वामी विवेकानंद का व्यापक प्रभाव रहा है. उनका मानना है कि इस वक्त तमिलनाडु के सामने मौजूदा मुद्दे क्या हैं. वे मानते हैं कि राज्य में नेतृत्व का शून्य है जो लोगों को अपनी पूरी क्षमता साकार करने से रोक रहा है. हर कोई परेशान है किसान, जवान हमें इन सब चीजों को ठीक करना चाहिये. रजनीकांत ये इशारा करना चाहते हैं कि वो द्रविड़ राजनीति से फासला बना कर चल रहे हैं और खुद जरूरतमंदों के मसीहा बनना चाह रहे हैं. उनके इस कदम को देख कर ये साफ तौर पर कहा जा सकता है कि अन्नाद्रमुक के संस्थापक एमजीआर के नक्शेकदम पर चलना चाहते हैं.
,   एमजीआर की सियासी विरासत को हासिल करने के लिये रजनीकांत के इस गेम से कुछ परेशान हैं तो कुछ उसे सामान्य कह कर उन्हें हलका ले रहे हैं. वे एमजीआर का आभामंडल खड़ा करने की कोशिश कर सकते हैं लेकिन राजनीतिक पंडितों का मानना है कि दोनों के बीच बड़ा फासला है. इनता ही नहीं एमजीआर को असल जिंदगी में भी वही काम करने के लिये जाना और देखा जाता था जिसका उन्होंने मुख्यमंत्री बनने से पहले परदे की जिंदगी में वादा किया था. रजनीकांत इस मामले में पूरी तरह चूक गये।
,   इस सितारे ने अपना बहुत कुछ शुरुआती लोकप्रियता विलेन के कुछ ऐसे किरदार निभा कर की थी जैसे उनका सिगरेट पीने का अंदाज. ये वो दौर था जब रजनीकांत ने अपनी सियासी छवि के बारे में सोचा भी नहीं था. रजनीकांत इस समय संगठन को खड़ा करने और पोलिंग बूथ कमेटियां बनाने पर खासा जोर लगा रहे हैं. यह उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से प्रभावित होकर किया है. दरअसल इसी के जरिये भाजपा कई राज्यों परचम लहरा चुकी है. दक्षिण का यह सितारा भी उसी राह पर आगे बढ़ रहा है.
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