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अनोखे अंदाज के अदाकार- शम्मी कपूर

udaybhoomi 4/1/2019/span> Technology

विकल्प शर्मा : मुंबई : हिंदी सिनेमा के रुपहले पर्दे पर एक नई और अनोखी शैली विकसित करने वाले शमशेर राज कपूर उर्फ शम्मी कपूर पर्दे से अलग हटकर विमर्श का हिस्सा क्यों नहीं बन पाए ? यह सवाल आज भी उनके चले जाने के बावजूद उभर रहा है. ऐसा लगता है कि उनके समानांतर कई कलाकार नहीं चाहते थे उनके सिनेमा और उनकी शैली पर विमर्श हो. यही वजह थी कि उनके समकक्ष कई कलाकारों ने उनके अभिनय और शैली पर सवाल उठाते हुए यह दलील दी थी कि शम्मी कपूर ने कोई अनोखा और नया काम नहीं किया.
,   इस कड़ी में पहला नाम दिलीप कुमार का जोड़ा जा सकता है. यदि दर्शकों को दिलीप कुमार की ‘राम और श्याम’ तथा ‘लीडर’ याद हो तो सवाल निश्चित तौर पर उभरेगा. इन फिल्मों के निर्देशकों ने दिलीप कुमार से साफ तौर पर कहा था कि मुझे इन किरदारों में शम्मी की शैली चाहिए. इस पर दिलीप कुमार ने सवाल उठा दिया था कि यह तो कापी हो जाएगी लेकिन दिलीप साहब की लाख जिद के बावजूद उन्हें शम्मी कपूर की शैली का अनुसरण करना पड़ा. यह सवाल आज भी प्रासंगिक है. गौरतलब है कि ‘लीडर’और ‘राम और श्याम’दिलीप कुमार दो फिल्में है, जो उनके अभिनय कैरियर में मील का पत्थर सिद्ध हुई.
,   दिलीप कुमार को शम्मी कपूर का कायल होना चाहिए, क्योंकि दिलीप साहब अपनी अभिनय यात्रा में निश्चित तौर पर शम्मी कपूर की शैली का पीछा करते हुए आज भी देखे जा सकते है क्योंकि कुछ लोगों ने यह धारणा बना रखी थी कि शम्मी का अभिनय केवल अब उछल-फांद तक सीमित था. यहां यह देखना नयापन था. उनकी हर दूसरी फिल्म अभिनय के व्याकरण का विस्तार करती दीखती है. दूसरा महत्वपूर्ण पहलू उनके ऊपर फिल्माये गए वो गीत थे, जिन्हें आज काल्पनिक गानों की श्रेणी में रखा जाता है. शायद यही कारण था कि मोहम्मद रफी उन्हें बेजोड़ अभिनेता मानते थे.
,   फिल्मों में आने से पहले शम्मी कपूर पिता पृथ्वीराज कपूर के पृथ्वी थियेटर से जुडे़ थे. वेतन था 50 रूपए. चार साल तक मंजने के बाद उन्होंने 1952 में पृथ्वी थियेटर छोड़ा तो उनका वेतन 300 रुपये तक पहुंच गया था. फिल्मों के शुरुआती दिनों में उनकी पतली मूंछें थीं और वे गंभीर किरदार निभा रहे थे. तब उन्हें प्रतिष्ठा और पहचान नहीं मिल पा रही थी. इन परिस्थितियों में उनकी पत्नी गीताबाली ने महसूस किया कि शम्मी को बेधड़क और खुले दिल के नौजवान की भूमिका निभानी चाहिए. तब उनका ‘मेकओवर’हुआ. मूंछें साफ हो गई ओर बालों को स्पेशल कट दिया गया. इसके बाद निर्देशक नासिर हुसैन की रोमांटिक कामेडी ‘तुमसा नहीं देखा’में पहली बार हिंदी सिनेमा के दर्शकों ने आधुनिक नौजवान युवक को देखा.
,   राजकपूर, दिलीप कुमार और देवानंद की तिगड़ी को भेदकर शम्मी कपूर बेपरवाह नायक के रूप में पर्दे पर अवतरित हुए. उनका रॉक स्टार जैसा अंदाज बहुत पसंद किया गया, फिर तो एक अलग परंपरा निकली. नया नायक अपनी बदमाशियों के साथ प्रेमिकाओं से मर्यादित छेड़खानी करता हुआ दर्शकों को भाता चला गया. बिंदास और बदमाश होते हुए भी शम्मी कपूर के निभाए किरदार अश्लील और अमर्यादित नहीं थे.
,  1961 में ‘जंगली’आई और वह सितारों की प्रथम कतार में शामिल हो गए.
,   आजादी के बाद शम्मी कपूर के रूप में हिन्दी फिल्मों को पहला नायक मिला, जो किसी बोझ को लेकर नहीं चला. वह दिलफेंक था, लड़कियों का पीछा करता था और उनका दिल जीतने के लिए अजीबो-गरीब हरकतें करने से नहीं हिचकता था. फिर भी वो बुरा नहीं लगता था. नायक के तौर पर लंबी और सफल पारी खेलने के बाद शम्मी कपूर ने चरित्र भूमिकाओं से दर्शकों का दिल जीता. उन्होंनें फिल्म निर्देशन में भी हाथ आजमाया. वीडियो का चलन बढ़ा तो उन्होंने शम्मी कपूर प्रजेंट्स मनोरंजन नाम से वीडियो पत्रिका पेश की, लेकिन भीड़ बढ़ने से छह अंकों के बाद उसे बंद कर दिया. फिर इंटरनेट का दौर आया तो वे सबसे आगे नजर आए. इंटरनेट सर्फिंग उनका प्रिय शगल था.
,   शम्मी कपूर आम लोगों का चरित्र जीते थे. वे खुद को आम इंसान की तरह पेश करते थे. उन्हें चर्चित बनाने में उनकी सहज और सरल अंदाज वाली भूमिका का खूब योगदान रहा. फिर उन्हें चर्चा में लाने वाले कुछ संगीतकार भी थे, जिन्होंने तड़क-भड़क वाले संगीत पर थिरक थिरक कर दर्शकों में लोकप्रिय बनाया. शम्मी कपूर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर अवार्ड फिल्म ‘ब्रहमचारी’(1968)के लिए और सह-अभिनेता का फिल्म फेयर अवार्ड फिल्म ‘विधाता’(1984)के लिए मिला. यह संयोग ही है कि हिंदी फिल्मों के इस रॉक स्टार की अंतिम फिल्म निर्देशक इम्तियाज अली की ‘रॉक स्टार’थी, जिसमें उन्होंने रणबीर कपूर के साथ काम किया है.
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