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काम्यकेश्वर तीर्थ बना प्रवासी पक्षियों की शरणस्थली

udaybhoomi 5/1/2019/span> Technology

वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक : कुरुक्षेत्र : कभी पांडवों की शरणस्थली रहा काम्यकेश्वर तीर्थ आज प्रवासी पक्षियों को आश्रय दे रहा है. इस वर्ष काम्यकेश्वर तीर्थ से लगते प्राकृतिक तालाब में हजारों की संख्या में प्रवासी पक्षी अठखेलियां करते दिखाई दे जाएंगे. डॉ तरसेम कौशिक जीवविज्ञान प्राध्यापक राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय हथीरा ने बताया कि कमोदा के काम्यकेश्वर तीर्थ के परिसर में सुदूर प्रदेशों से आए प्रवासी पक्षियों जैसे सूचिपूछ बत्तख, सामान्य टील, नीलपक्ष टील, मैलार्ड, गैडवल, विजियन, शिखी पोचार्ड, पिंकशीर्ष बत्तख, रक्तशिखी पोचार्ड, सरपट्टी सवन, सिलेटी सवन, तिदारी बत्तख, सिख पर बतख, बेखुर बतख, चेता बतख, नकटा, छोटी सिल्ही इत्यादि की कलरव ध्वनि आपको सुनाई दे जाएगी.
,   डॉ कौशिक ने बताया कि वह पिछले 15 वर्षों से डॉ रोहताश गुप्ता पूर्व अध्यक्ष प्राणीशास्त्र विभाग कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के मार्गदर्शन में हरियाणा के प्राकृतिक तालाबों मैं प्रवासी पक्षियों के प्राकृतिक इतिहास का अध्ययन कर रहे है. उन्होंने बताया कि पिछले 15 वर्ष में प्रवासी पक्षियों की संख्या में भारी कमी आई है. इसका मुख्य कारण तालाब में मछली संवर्धन, साफ पानी की कमी तथा ग्रामीणों के विभिन्न दैनिक क्रियाकलापों के द्वारा उत्पन्न बाधाएं हैं. डॉ कौशिक ने बताया कि प्राचीन काल से ही भारतवर्ष की संस्कृति अतुलनीय रही है. हमारी संस्कृति में अतिथि को देवता तुल्य कहा गया है अर्थात अतिथि देवो भवः. प्रवासी पक्षी भी उत्तर भारत मे अपने शीतकालीन प्रवास के लिये अतिथि बनकर आते हैं. प्रवासी पक्षियों का प्रव्रजन आदिकाल से ही मनुष्य के लिये कौतुक का विषय रहा है.
,   प्राचीन काल से ही प्रवासी पक्षी हजारों किलोमीटर दूर स्थित अपने प्रजनन स्थल से उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों जैसे हरियाणा के पोखरों, तालाबो,झीलों, नदियों में अपने शीतकालीन प्रवास के लिए आते हैं. सर्दियों के आगमन के साथ ही प्रवासी पक्षियों का आगमन भी प्रतिवर्ष नवंबर माह से शुरू हो जाता है तथा फरवरी के पश्चात यह प्रवासी पक्षी अपने मूल निवास को लौटना प्रारंभ कर देते हैं. हरियाणा प्रदेश ने प्राकृतिक तालाबों मैं मछली संवर्धन के क्षेत्र में बहुत प्रगति की है. हरियाणा की सभी ग्राम पंचायतों के द्वारा प्राकृतिक तालाबों को मछली पालन के लिए ठेके पर दे दिया जाता है. ठेकेदार मछली संवर्धित तालाबों को धागों की जालनुमा संरचना से आच्छादित कर देते हैं ताकि इन तालाबों में प्रवासी पक्षी आश्रय न ले पाएं. डॉ गुप्ता तथा डॉ कौशिक ने बताया हरियाणा सरकार की इस नीति के द्वारा हालांकि मछली संवर्धन के क्षेत्र में हरियाणा ने उल्लेखनीय प्रगति की है परंतु इसके फलस्वरूप विगत वर्षों से हरियाणा के प्राकृतिक तालाबों में प्रवासी पक्षियों की संख्या में बहुत अधिक कमी आई है.
,   डॉ तरसेम कौशिक ने बताया कि ये प्रवासी पक्षी सुदूर प्रदेशों जैसे साइबेरिया, रूस, कैस्पियन सागर, अफगानिस्तान, चीन, तिब्बत इत्यादि स्थानों से भोजन तथा आश्रय की खोज में हजारों किलोमीटर की दूरी तय करते हैं. परंतु प्रवासी पक्षियों को अपने शीतकालीन प्रवास के दौरान न तो पर्याप्त मात्रा में भोजन उपलब्ध हो पाता है और न ही उनको आश्रय मिल पाता है. डॉ गुप्ता तथा डॉ कौशिक ने बताया की पक्षियों के प्रव्रजन की प्रक्रिया हजारों वर्षों से अनवरत जारी है. प्राचीनकाल से ही आध्यात्मिक दृष्टि से संपन्न प्राकृतिक तालाबों में जैव विविधता अधिक रही है. आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध इन तालाबों में विभिन्न प्रजातियों के लुप्तप्राय कछुए, पक्षी तथा अन्य जलीय जीवों का संरक्षण होता रहा है.
,   काम्यकेश्वर महादेव मंदिर तथा तीर्थ भी आध्यात्मिक दृष्टि से महत्व रखता है. ऐसी मान्यता है कि शुक्ला सप्तमी के शुभ दिन इस सरोवर में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है. प्रवासी पक्षियों का आकर्षण सदा से ही इन सरोवरों की तरफ रहा है क्योंकि यहां पर प्रवासी पक्षियों को भोजन, आश्रय तथा सुरक्षा मिल जाती है. उन्होंने कहा कि हालांकि हरियाणा सरकार ने हरियाणा डेवलपमेंट, प्रोटेक्शन एंड कंज़र्वेशन बिल का ड्राफ्ट नोटिफाई किया है ताकि तालाबों को संरक्षित किया जा सके. डॉ गुप्ता तथा डॉ कौशिक के अनुसार हरियाणा सरकार को चाहिए कि ऐसे तालाबों को नामांकित तथा संरक्षित करें जहॉ प्रवासी पक्षी अपने शीतकालीन प्रवास के लिए आते हैं. इन प्राकृतिक तालाबों का नवीकरण ने करके पुनर्वास करें ताकि यह प्राकृतिक तालाब अपनी मूल अवस्था में ही प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करते रहे तथा हमारी आने वाली पीढियां भी इन प्रवासी पक्षियों पक्षियों को देखकर आत्मिक शांति तथा सौंदर्य बोध की अनुभूति कर सकें.
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