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आमार सोनार बांगला

udaybhoomi 6/1/2019/span> Technology

विकल्प शर्मा : नयी दिल्ली : नए साल का आगाज़ जिस अंदाज़ से हुआ उससे भारतीय उपमहाद्वीप में लोकतंत्र और लोकशक्ति के ताकतवर होने की उम्मीद बंधी है. पडोसी देश बांग्लादेश बंग बंधु शेख मुजीबुर्रहमान की आवामी लीग पार्टी की धमाकेदार जीत से साफ है कि यह देश आज भी उन्हीं सिद्धांतों पर चल कर अपना आगे का सफ़र तय करना चाहता है जिसकी बुनियाद शेख साहेब ने राखी थी.
,   अब उनकी पुत्री शेख हसीना वाजेद इस पार्टी का नेतृत्व सँभालते हुए पिछले दस वर्ष से प्रधानमंत्री के पद पर हैं. आवामी लीग को बांग्लादेश की कांग्रेस पार्टी माना जाता है क्योंकि 1971 में इसने जब पूर्वी पाकिस्तान को स्वतंत्र बांग्लादेश बनाया था तो महात्मा गाँधी के प्रेम और अहिंसा के सिद्धांत और धरातल पर धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की संरचना की थी जबकि उस समय भी यह मुस्लिम आबादी वाला था. पर 31 दिसंबर 2018 को हुए चुनाव परिणाम इसलिए आश्चर्य में डालने वाले हैं कि नए देश के उदय के 47 वर्ष बीत जाने के बाद भी इस्लामी व कट्टरपंथी ताकतों को यहाँ की जनता ने बंगाली समाज की महान संस्कृति को भ्रष्ट करने की इजाजत नहीं दी है और अपने मुक्ति संग्राम के रणबांकुरों की वीरगति से किसी भी प्रकार का समझौता करने को राष्ट्र का अपमान समझा है.
,   2018 के अंतिम महीने में हुए आम चुनाव इसलिए भी साधारण नहीं थे क्योंकि इस देश की कथित राष्ट्रवादी कही जाने वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने इस्लामी जेहादी तंजीम जमाते इस्लामी के लोगों से परदे के पीछे हाथ मिलाते हुए अपना चेहरा उन बैरिस्टर कमाल हुसैन को बनाया था जो बंग बंधु की पहली बंगलादेशी सरकार में कानून मंत्री बनाये गए थे और इस देश का संविधान लिखने में जिनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. बी एन पी ने अपनी नेता बेगम खालिदा जिया के भ्रष्टाचार के आरोपों में दस वर्ष की सजा पाने के बाद विभिन्न विरोधी कट्टरपंथी ताकतों का मोर्चा बना कर यह चुनाव लड़ा था और उस जमात पार्टी के 22 नेताओं को टिकट दिया था जिसने 1971 के मुक्ति संग्राम में पाकिस्तानी फौजों की बुद्धिजीवियों की हत्या कराने से लेकर आम नागरिकों पर जुल्म ढहाने के काम किये थे. साथ ही वर्तमान में पाकिस्तान की शह पर उसकी आतंकी तंजीमों तक की वकालत करने से पीछे नहीं रहतीं थीं. हालांकि शेख हसीना की सरकार ने जमाते इस्लामी पर प्रतिबन्ध लगा कर उसे उसे चुनाव लड़ने से रोक दिया था मगर खालिदा जिया की बी एन पी से शुरू से उसका गहरा रिश्ता रहा है. दूसरी तरफ शेख हसीना की आवामी लीग ने अपने देश की अन्य धर्मनिरपेक्षतावादी लोकतान्त्रिक पार्टियों से गठबंधन किया था जो बंगला संस्कृति को सर्वोच्च रखा कर अपने देश आर्थिक विकास करना चाहतीं थीं.
,   इस देश की संसद के 300 स्थानों के लिए हुए चुनावों में से 288 पर आवामी लीग की ऐतिहासिक जीत हुई है. पर बैरिस्टर कमाल हुसैन ने इन चुनावों में धांधली का आरोप लगाया है और पुनः 90 दिन के भीतर चुनाव कराने की मांग की है. उनका यह आरोप उन विदेशी ताकतों को खुश कर सकता है जो भारतीय उपमहाद्वीप में कट्टरपंथी ताकतों को देखना चाहते हैं. कई पश्चिमी देश भी ऐसे हैं जो बांग्लादेश की वर्तमान नेता शेख हसीना की उदारवादी नीतियों के आलोचक हैं. परन्तु सच ये है कि पिछले दस वर्षों में शासन के दौरान शेख हसीना ने कट्टरपंथियों की नाक में नकेल डाल कर अपने देश का सर्वंगीण आर्थिक विकास किया है और अल्पसंख्यक हिन्दुओं को भयमुक्त करते हुए समान अधिकारों से उन्हें लैस किया है. बांग्लादेश फिलहाल दक्षिण एशिया का सबसे तेज गति से विकास करता मुल्क है और इसकी ताजा विकास वृद्धि दर भारत से भी ज्यादा 7.8 प्रतिशत है.
,   शेख हसीना की सबसे बड़ी उपलब्धि यह कही जाएगी कि उन्होंने अपने देश का राजधर्म इस्लाम होते हुए भी कट्टरपंथी और आतंकी ताकतों को इस देश में जमने नहीं दिया और अपने देश की संस्कृति पर इसका साया भी नहीं पड़ने दिया. यह सब उन्होंने लोकतंत्र के अंतर्गत ही किया और लोगों के समर्थन से किया. जबकि दूसरी ओर 2001 से 2006 तक बी एन पी की मुखिया बेगम खालिदा के शासनकाल में इस्लामी कट्टरपंथ अपने चरम पर पहुँच गया था और पाकिस्तान की आतंकवादी तंजीमों ने अपने पैर ज़माने शुरू कर दिए थे.
,   शेख हसीना के दल का ये नारा पूरे चुनाव में छाया रहा-आमार सोनार बंगला और जय बंगला. इसके साथ ही उन्होंने अपने देशवासियों को सामाजिक व आर्थिक रूप से सशक्त किया और बांग्लादेश को औद्योगिक मानचित्र पर लाने की तैयारी शुरू कर दी और भारत में अवैध बांग्लादेशियों के शोर के बावजूद नयी दिल्ली के साथ दोनों देशों के बीच सड़क और रेल मार्गों का विस्तार किया. उनका पुनः सत्तारूढ़ होना भारत के लिये शुभ संकेत है जिसके चलते हमारी पूर्वी सीमा पर प्रेम व सौहार्द्र के गीत गाये जाते रहेंगे.
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