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कृष्ण को कथक का प्रणेता माना जा सकता है-शोवना नारायण

udaybhoomi 6/1/2019/span> Technology

विकल्प शर्मा : नयी दिल्ली : वे किसी परिचय की मोहताज नही. ‘पदम श्री’समेत कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजी जा चुकी शोवना नारायण ने कई किताबें लिखी है, लेकिन हम सब उनके जिस रूप से परिचित है वो नृत्यांगना का है. कम ही लोगों को मालूम होगा कि वे एक प्रशासनिक अधिकारी भी है. शोवना 1976 बैच की आईएएस अधिकारी हैं. संभवतः वे ऐसी पहली अधिकारी होंगी, जिन्होनें एक दूसरे क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय ख्याति हासिल की है औैर दोनों क्षेत्रों में गजब का संतुलन आज भी कायम करके रखा है.
,   वे बतौर प्रशासनिक अधिकारी जहां भी रहती हैं, उस बारे लगभग नही ही बात करती. इसलिए नही कि वे अपनी प्रशासनिक पहचान को पर्दे में रखना चाहती हैं बल्कि इसलिए कि वे अपने दोनों रूपों मे घालमेल नही करना चाहती. वे कहती है, एक अधिकारी के तौर पर बात करने में कई बार नैतिक और अधिकारिक अड़चने आती हैं. बहरहाल, शोवना सामाजिक रूप में सक्रिय एक संवेदनशील महिला औैर कलाकार हैं. वे महिलाओं से जुड़ी समस्याओं को लेकर भी काफी मुखर रही है. उन्होने अपनी कई नृत्य-रचनाएं भी सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित की हैं. शोवना का शोध इत्यादि में भी गहरा रुझान है. उनके इसी रुझान के चलते गया (बिहार) के पास तीन कथक गांवों का पता चला, जो वाराणसी में कथक का एक दस्तावेज बन गया है. प्रस्तुत हैं शोवना नारायण से विकल्प शर्मा की बातचीत के प्रमुख अंश-
,   प्रश्न - कृष्ण पहले आए या कथक ? क्या कृष्ण को कथक नृत्य का जन्मदाता कहा जा सकता है ?
,   उत्तर - माघ के महीने में, शुक्ल पक्ष नक्षत्र में, वाराणसी के उत्तर में, गंगा नदी के किनारे कथक के श्रृंगार नृत्य ने भगवान आदिनाथ को प्रसन्न किया. चौथी सदी ईसा पूर्व के प्राकृत लिपि के इस लेख का अन्वेषण बहुत ही महत्वपूर्ण दिखाई देता है. इस लेख में ध्यान देने योग्य विषय है- ‘सव्वों कथिकों भिंगार नतेनाम’, इसमें ‘सव्वों’का अर्थ है सबके, ‘कथिकों’कथक के लिए, 'भिंगार’श्रृंगार के लिए और ‘नेतनाम’नृत्य के लिए प्रयुक्त हुआ है. इस सबका पूर्ण अर्थ है कि यहां जिस कथक का उल्लेख किया गया है वो एक नर्तकी का समूह है, वो अपने भव्य नृत्य के लिए जाना जाता था. वास्तव में, गायन और नृत्य के प्राकृत लेख के अनुसार (मौर्यकाल) में ‘कथक’श्रृंगार नृत्य करने वाले नर्तक थे औैर यह नृत्य धर्म से बहुत ही ज्यादा प्रभावित था जिससे दोनों नर्तक औैर दर्शक (रसिका) को आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति होती थी. हालांकि यह साफ नही है कि ये लेख भगवान शिव या कृष्ण या किसी और की तरफ इशारा करते है, लेकिन चौथी सदी के प्राकृत लेख में श्रृंगार नृत्य और भगवान आदिनाथ का साथ में उल्लेख मिलने से यह जरूर लगता है कि भगवान शिव की उपासना से प्रेरित थे. परन्तु यह भी सत्य है कि चौथी सदी में चंद्रगुप्त मौर्य का शासन था, जो जैन धर्म स्वीकार कर चुका था.
,   12वीं से 17वीं सदी के भक्ति आंदोलन ने , श्रृंगार के अंदर एक नया तत्व जोड़ उसे नए वस्त्रों में पेश किया. इनका चित्रीकरण राधा-कृष्ण की कथाओं, मनुष्य की (दुख, भक्ति, इच्छाओं) भावनाओं से मुख्य रूप से किया गया है. ध्रुपद, धमार, पद ठुमरी, भजन सभी हिंदू देवी-देवताओं के स्वर आधारित थे औैर ये पुराने कथकों के द्वारा श्रंगार और भक्ति के तत्वों के साथ प्रदर्शित किए गए थे. जगह के संदर्भ में नृत्य की शैलियों औैर मंदिरों से इनके संबंध के बारे में एक विशेष घटना का उल्लेख कुछ शताब्दी पूर्व प्रियदास के द्वारा रिकार्ड किया गया था, जिसने नाभाजी के भक्तमाल (1712 में लिखा गया) की कमेंट्री की थी (पहले जिसका उल्लेख किया जा चुका है।)
,   कथक का नटवारी नृत्य भाग, जो गंगा के मैदानी क्षेत्रों में किया जाता है, का आधार ‘ता थई थई तत’ध्वनि शब्दों पर आधारित है. इसके बारे में यह माना जाता है कि इसका प्रादुर्भाव श्री कृष्ण के चरणों से हुआ था, तब उन्होनें तांडव नृत्य किया था. हालांकि कथक की सबसे पुरानी जानकारी हमें चौथी सदी ईसा पूर्व के श्लोक से मिली, जोकि भगवान शिव के लिए किए गए कथक नृत्य के बारे में बताता है. इसलिए नटवारी नृत्य के ध्वनि शब्दों में मृदंग के ध्वनि शब्दों का प्रयोग नही होता, क्योंकि इसका संबंध भगवान शिव से है. मृदंग से निकले (आधारित) कथक के ध्वनि शब्दो को परम कहा जाता है, जो भगवान शिव से संबंधित है.
,   प्रश्न - रास को किस तरह से कथक नृत्य के साथ जोड़ा जा सकता है?
,   उत्तर - भारत में मुस्लिम शासन के साथ धार्मिक पुनर्जागरण का उदय हुआ, तो भक्ति आंदोलन था. भक्ति आंदोलन से वैष्णव संप्रदाय का उदय हुआ, जिससे गंगा के मैदानी क्षेत्र में न केवल साहित्य और काव्य बल्कि नृत्य का भी विकास हुआ. जैसा कि ‘रास सर्वस्व’पुस्तक में विवरण है. स्वामी हरिदास ने विट्ठलनाथ (बल्लभाचार्य के पुत्र) को रास (एक नृत्य, जिसका केंद्रबिंदु श्रीकृष्ण थे) के मंचन में लिए प्रेरित किया. घमण्ड देव और बाद में नारायण दत्त ने भी इस रासलीला को दोहराया. श्री वल्लभ नामक एक राजस्थानी कथक को कडहेला (वृंदावन के निकट) लीला के मंचन में सहायता के लिए बुलाया गया था. इस प्रकार रासलीला का विकास किशोरों के साथ हुआ, जिसमें श्रीकृष्ण, राधा और गोपियों के चरित्रों का मंचन किया गया. हरि जो आचार्य नारायण भट्ट के साथ ऊंचागामी (बृज) में बस गए और आचार्य घमण्ड देव ने रासलीला को उसका वर्तमान स्वरूप दिया, जिसमें विभिन्न तथ्य कथक नृत्य से लिए गये हैं. रास प्रदर्शन के दौरान हर श्रखंला के अंत में इशारों और लयबद्ध (पैटर्न) का खूब उपयोग होता है. तकनीकी शब्दों में नृत्य की स्थितियों, ध्वनि शब्द, विभिन्न क्रियाएं कथक की स्मृति ताजा कराते हैं. इसमें तोड़ा, टुकड़ा, कवित्त, पिरमिनस, चक्रधर प्रण, तिहाई आदि का प्रयोग किया जाता है.
,   प्रश्न - परंपरा और प्रयोग को कायस रखते हुए किस तरह से इसे सामाजिक विषयों के साथ जोड़ा जा सकता है?
,   उत्तर - किसी का भी जीवन रुका हुआ अपरिवर्तनशील नहीं होता. वास्तव में परिवर्तन ही जीवन की सच्चाई है. कला के क्षेत्र में भी उसका मूलभूत तत्व हमेशा स्थित रहता है. कला की आत्मा वहीं रहती है, परन्तु उसका बाहरी स्वरूप (प्रदर्शन) निरंतर बदलता रहता है. सभी कच्चे कलाकारों के लिए प्रशिक्षण और रियाज उसके औजार, भाषा या विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र हैं, परन्तु अंत में उनकी कला उनके व्यक्तित्व, विचारों और भावों को व्यक्त करती है. वास्तविक जरूरत तीव्र अंतरइच्छा की है. मैं उन कलाकारों में से हूं, जो अपनी कला की परंपरा में इतने आत्मिक रूप से डूबे होते हैं कि नृत्य शैली की सीमाएं कोई प्रश्न खड़ा नही कर पाती. मैंने जो भी चाहा, उसे कथक के माध्यम से सफलतापूर्वक व्यक्त कर पाईं हूं. मेरे खुद के नृत्य कैरियर के दौरान, नवीनीकरण एवं नृत्य के तत्सामयिक होने की आलोचना की गई है, जो कभी-कभार मेरे नृत्य में नजर आती है. मुझे कभी-कभी आश्चर्य होता है कि किसी ने कभी साफ मन से उन्हे नही उकेरा. ये शायद मेरे पारिवारिक स्थिति की वजह से भी हो सकता है, जो एक व्यक्ति की शिक्षा में बहुत ही महत्वपूर्ण है. हम सभी प्रभावित होते हैं और हमारे विचार बदलते रहते हैं. कुछ विचारों की अभिव्यक्ति भी होती है, ऐसे माध्यमों से जिससे कि व्यक्ति सहज महसूस करें. मेरे लिए यह माध्यम नृत्य है. प्रत्येक कलाकार का अपना तरीका होता है अभिव्यक्ति का और यह देखने में अच्छा लगता है कि एक ही विषय विभिन्न कलाकारों द्वारा विभिन्न तरह से पेश किया जाता है.
,   प्रश्न - आपका जो अभिनय पक्ष है, उसके पीछे जो कथाओं का संसार बनता है, उसे आप कैसे देखती हैं ?
,   उत्तर - यह मेरे परिवार और मेरे माता-पिता की भारतीय विचारधारा और साहित्य में रुचि है, जिसने मुझे प्रभावित किया है. इसमें कुछ हाथ मेरी हिंदी और संस्कृत साहित्य में रुचि का भी है. मुझे याद है कि बचपन में मेरी माँ ग्रंथों से श्लोक सुनाती थी. ये मेरी माँ की गहरी रुचि और मेरा हिंदी, संस्कृत साहित्य के प्रति प्रेम था, जो अभिनय के रूप में बाहर आया। यह रोमांच की वैचारिक अंतरध्वनि थी, जो मुझे ज्यादा प्रेरित करती थी. मैं साहित्य की दुनिया को खोलना चाहती थी, जो कथक के इतिहास में था और उन श्लोकों से इतर था जो मुझे सिखाए गये थे.
,   प्रश्न - कथक ग्राम पर अपने एक वृहद और विस्तारित अनुसंधान किया हैं आने वाली पीढ़ी के लिए यह खोज कितनी प्रभावी है?
,   उत्तर - यह बहुत उत्सुकता का विषय है कि आपको सूचना तब मिले, जब उसकी आशा भी न कर सकें. अपनी बिहार यात्रा के दौरान एक दर्शक ने मुझे बताया कि एक गांव है, जिसका नाम कथक ग्राम है. यह बिहार के औरंगाबाद के नजदीक है. हम वहां गए और इस गांव को दक्षिणारक सूर्य मंदिर (औरंगाबाद-देव मंदिर) से ढूंढना शुरू किया. पूरे दिन ढूंढने के बाद हमने इसे एक पहाड़ी के नीचे बसा पाया, जिस पहाड़ी पर सूर्य मंदिर स्थित था. गांव की शुरुआत में ही एक स्कूल था, जिसके बोर्ड को देखकर हम गांव का नाम कथक ग्राम पक्का कर सके. ग्रामीण, जो कथको की जाति से अलग थे, ने हमें बताया कि दो दशक पहले यहां के ग्रामीणों में कथक भी थे जो कथक कला से ही जीविकोपार्जन करते थे और उनकी जाति कथक बताई जाती है. वे परंपरागत रूप से सूर्य मंदिर के आस-पास ही अपनी कला प्रस्तुत करते थे. हमें यह भी सूचना मिली कि इस ग्राम का अस्तित्व कई शताब्दियों से है. 12वीं सदी के मध्य में यहां सैकड़ो परिवार थे, जो अब न के बराबर रह गये हैं. उनमें से ज्यादातर मुंबई में आर्टिस्ट के तौर पर फिल्मों में काम करते हैं. यह वास्तव में दुःखद कथा है.
,   एक युवा संस्कृत विद्वान डा, कमल किशोर मिश्रा ने मुझे कथक से संबंधित दो प्राचीन लिपियां दिखाई, जो उसे मैथिली में कमलेश्वर पुस्तकालय से मिली थी. इन्हे पढ़कर मुझे खुशी हुई कि दोनों में ही कथको का एक नृत्य करने वाले समाज के रूप में वर्णन था. प्राकृत श्लोक में कथक के श्रृंगार नृत्य के बारे में वर्णन था. वो चौथी या 5वीं सदी ईसा पूर्व का था, जबकि ये दोनों प्राचीन संस्कृत की रचनांए नृत्य को कथकों का धर्म और कथक नृत्य को शुरुआती मौर्यकाल का बताते हैं. ये सभी तथ्य मुझे आश्चर्यचकित करते है कि कला इतिहासविदों के द्वारा ये सब संज्ञान में क्यों नहीं लिए गए. फिर मैं यह भी सोचती हूं कि संभव नहीं उनके लिए सब कुछ जानना. हर गुजरे साल के साथ मेरा कथक ज्ञान बढ़ता जाता था और जब मैंने अपनी कथक पर पहली पुस्तक लिखी, उस समय मुझे कथक ग्राम और मिथिला के संस्कृत श्लोंको के बारे में मालूम नही था. यह स्थिति और कलारूपों के लिए सच हो सकती है. शोध और ज्ञान का उद्भव एक निरंतर खोज के विकास की प्रक्रिया है.
,   प्रश्न - क्या खजुराहों की प्रतिमाओं में कथक स्वरूप मिलता है ?
,   उत्तर - खजुराहों के मंदिरों में जो मूर्तियां है, उनमें से ज्यादातर मूर्तियां कथक से और अन्य नृत्य रूपों से मिलती-जुलती है. जो मुख्य स्थिति है कथक उसे संभंग कहते है लेकिन कथक में सभी स्थितियों, भगिमाओं जैसे कि अभंग और त्रिभंग और अस्थिर क्रियाओं जैसे कि चरित्र, मण्डली का प्रयोग करते है. खजुराहो मुझे जीवन की विचारधाराओं को समेटे दिखता है. चाहे ये जीवन-मरण का चक्र हो या जीवन का उत्सव. इसका ढ़ांचा जीवन के विभिन्न चरणों को दर्शाता है.
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