जहां आस्था की गूंज हो, वहां डीजे का शोर क्यों?

लेखक : तरुण मिश्र
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। देश-विदेश में आयोजित होने वाले व्याख्यानों में एक प्रखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। जनसेवक के रुप में प्रख्यात है।)

धार्मिक स्थल केवल पत्थरों से बने मंदिर, ऊंचे शिखर या पूजा की जगह नहीं होते। इनके साथ करोड़ों लोगों की आस्था, परंपरा, भावनाएं और सदियों पुरानी सांस्कृतिक स्मृतियां जुड़ी होती हैं। यही कारण है कि किसी मंदिर या तीर्थस्थल पर होने वाली गतिविधि को सामान्य मनोरंजन की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता। वहां उत्सव हो सकता है, सांस्कृतिक कार्यक्रम हो सकते हैं, लोककला को स्थान मिल सकता है, लेकिन सवाल यह है कि उस आयोजन का स्वरूप उस स्थान की मर्यादा के अनुरूप है या नहीं। श्री बद्रीनाथ धाम मंदिर में सितंबर में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम के वीडियो सामने आने के बाद तेज संगीत, डीजे और नृत्य को लेकर विवाद इसी मूल प्रश्न पर केंद्रित हो गया है। 19 और 20 सितंबर को श्री बद्रीनाथ धाम के निकट पर्यटक आगमन प्लाजा में दो दिवसीय सांस्कृतिक महोत्सव आयोजित किया गया था। बाद में कार्यक्रम के वीडियो सामने आए, जिनमें संगीत और नृत्य के दृश्य दिखाई दिए। इसके बाद धार्मिक स्थल पर इस तरह के आयोजन के औचित्य को लेकर बहस तेज हो गई। श्री बद्रीनाथ धाम धाम में सांस्कृतिक कार्यक्रम के वीडियो सामने आने के बाद वरिष्ठ भाजपा नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने भी आयोजन के स्वरूप पर आपत्ति जताई।

उन्होंने कहा कि श्री बद्रीनाथ धाम जैसे पवित्र धाम की अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक मर्यादाएं हैं। उनके अनुसार, जिस स्थान की परंपरा और वातावरण शांति, साधना और भक्ति से जुड़ा है, वहां तेज संगीत और डीजे जैसे आयोजनों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने धार्मिक स्थलों की पवित्रता, हिमालयी पर्यावरण और सदियों पुरानी परंपराओं को ध्यान में रखते हुए ऐसे आयोजनों के लिए स्पष्ट मर्यादा तय करने की आवश्यकता पर जोर दिया। यह बहस केवल श्री बद्रीनाथ धाम तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसे एक बड़े सामाजिक प्रश्न के रूप में देखना जरूरी है-क्या हर जगह मनोरंजन का एक ही स्वरूप होना चाहिए?

आज धार्मिक पर्यटन तेजी से बढ़ रहा है। लोग तीर्थयात्रा के साथ आसपास के प्राकृतिक और सांस्कृतिक स्थलों को भी देखना चाहते हैं। स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए पर्यटन महत्वपूर्ण है। कलाकारों को मंच मिलना भी जरूरी है। लोक संस्कृति को बढ़ावा देना भी अच्छी पहल हो सकती है। लेकिन इन सभी उद्देश्यों के बीच धार्मिक स्थल की मूल प्रकृति को बचाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। मंदिर के आसपास सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने और मंदिर परिसर अथवा उसके अत्यंत निकट तेज ध्वनि वाले मनोरंजन कार्यक्रम आयोजित करने में अंतर है। लोकगीत, भजन, शास्त्रीय संगीत, पारंपरिक नृत्य और स्थानीय संस्कृति की प्रस्तुतियां किसी क्षेत्र की पहचान को मजबूत कर सकती हैं। दूसरी ओर ऐसा आयोजन जिसमें मुख्य आकर्षण तेज ध्वनि, नृत्य और मनोरंजन बन जाए, उसके लिए स्थान और समय का चयन अलग तरीके से किया जा सकता है।

श्री बद्रीनाथ धाम जैसे धाम में आने वाला श्रद्धालु सामान्यत: शांति, दर्शन, पूजा और आध्यात्मिक अनुभव की अपेक्षा लेकर पहुंचता है। ऐसे में वहां का वातावरण भी उसी भावना के अनुरूप होना स्वाभाविक अपेक्षा है। हमारे समाज में एक विचित्र विरोधाभास भी देखने को मिलता है। कई परिवार धार्मिक कार्यों, पूजा-पाठ, मंदिरों में सहयोग या धार्मिक आयोजनों में खर्च करते समय कई बार अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देकर पीछे हट जाते हैं। लेकिन विवाह, जन्मदिन, स्वागत समारोह या दूसरे सामाजिक आयोजनों में तेज संगीत, सजावट और दिखावे पर बड़ी रकम खर्च करने में उतनी हिचक दिखाई नहीं देती। यदि किसी धार्मिक आयोजन के नाम पर लाखों रुपये ध्वनि, मंच, प्रकाश और मनोरंजन पर खर्च किए जा सकते हैं तो उसी समाज में मंदिरों की व्यवस्था, यात्रियों की सुविधा, स्वच्छता, जरूरतमंद श्रद्धालुओं की सहायता और धार्मिक स्थलों के संरक्षण पर अधिक ध्यान क्यों नहीं दिया जा सकता?

किसी धार्मिक स्थल पर चढ़ाया गया एक छोटा-सा सहयोग भी वहां की व्यवस्था में योगदान कर सकता है। किसी जरूरतमंद यात्री के भोजन, दवा या रहने की व्यवस्था में सहायता भी धार्मिक सेवा का हिस्सा हो सकती है। मंदिरों की स्वच्छता, जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय संस्कृति के संरक्षण पर खर्च किया गया धन भी लंबे समय तक उपयोगी रहता है। इसके मुकाबले कुछ घंटों का शोर खत्म होने के बाद उसके पीछे क्या बचता है-यह सवाल समाज को खुद से पूछना चाहिए। धार्मिक यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण वहां का वातावरण होता है। घंटियों की आवाज, मंत्रोच्चार, भजन, आरती, पहाड़ों की शांति, मंदिर की वास्तुकला और प्राकृतिक परिवेश मिलकर श्रद्धालु के लिए एक अलग अनुभव तैयार करते हैं। हिमालयी धामों की विशेषता ही उनकी प्राकृतिक शांति है। वहां ऊंचे पहाड़, नदियां, बर्फीली चोटियां और कठिन भौगोलिक परिस्थितियां अपने आप में आध्यात्मिक वातावरण बनाती हैं। ऐसे स्थानों पर आयोजन करते समय ध्वनि और भीड़ की सीमा को लेकर अतिरिक्त संवेदनशीलता जरूरी है। धार्मिक स्थल पर जाने वाला व्यक्ति किसी मनोरंजन पार्क में नहीं जाता।

वह अपनी आस्था से जुड़ा अनुभव प्राप्त करने जाता है। इसलिए वहां मनोरंजन का स्वरूप भी उसी अनुरूप होना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि धार्मिक स्थल आधुनिक समय से पूरी तरह अलग हो जाएं। नई पीढ़ी को स्थानीय संस्कृति से जोडऩा, युवाओं को भारतीय परंपराओं से परिचित कराना और लोक कलाकारों को मंच देना आवश्यक है। लेकिन आधुनिकता का अर्थ केवल तेज संगीत और बड़े मंच नहीं है। आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल मंदिरों की व्यवस्था सुधारने, श्रद्धालुओं की सुविधा बढ़ाने, स्वच्छता व्यवस्था मजबूत करने, आपदा प्रबंधन बेहतर करने और स्थानीय कला के संरक्षण में भी किया जा सकता है। यदि सांस्कृतिक कार्यक्रम करना ही है तो उसके लिए ऐसी जगह चुनी जा सकती है जहां मंदिर की पूजा व्यवस्था और श्रद्धालुओं की शांति प्रभावित न हो। कार्यक्रम का समय, ध्वनि की तीव्रता, भीड़ की संख्या और स्थानीय पर्यावरण को ध्यान में रखकर स्पष्ट नियम बनाए जा सकते हैं। यही संतुलित रास्ता धार्मिक परंपरा और पर्यटन, दोनों को साथ लेकर चल सकता है। धार्मिक पर्यटन से स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है। होटल, दुकान, परिवहन, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों से जुड़े लोगों की आय बढ़ती है। इसलिए धार्मिक स्थलों पर पर्यटन को पूरी तरह नकारना व्यावहारिक नहीं है। लेकिन जब तीर्थस्थल की पहचान ही मनोरंजन और बाजार आधारित गतिविधियों से होने लगे तो मूल उद्देश्य पीछे छूटने का खतरा रहता है।

श्री बद्रीनाथ धाम की पहचान केवल एक पर्यटन गंतव्य की नहीं है। यह चारधाम यात्रा का महत्वपूर्ण केंद्र है और लाखों श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था से जुड़ा है। इसलिए वहां होने वाली हर सार्वजनिक गतिविधि को इसी संवेदनशीलता के साथ देखना चाहिए। धार्मिक स्थल की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए शोर जरूरी नहीं है। उसकी संस्कृति, इतिहास, वास्तुकला, परंपरा, स्थानीय कला और प्राकृतिक सौंदर्य अपने आप में पर्याप्त आकर्षण हैं। श्री बद्रीनाथ धाम में हुए कार्यक्रम के बाद उठी बहस का सबसे सकारात्मक पहलू यही हो सकता है कि अब धार्मिक स्थलों पर होने वाले आयोजनों के लिए व्यापक दिशा-निर्देशों पर चर्चा हो।

कौन-सा कार्यक्रम कहां हो सकता है, उसकी ध्वनि सीमा क्या होगी, मंदिर से दूरी कितनी होगी, कितनी भीड़ की अनुमति होगी और स्थानीय धार्मिक परंपराओं का कितना ध्यान रखा जाएगा-इन सभी बिंदुओं पर स्पष्ट व्यवस्था जरूरी है। धार्मिक स्थल पर संस्कृति का उत्सव मनाना गलत नहीं है। गलत तब होगा जब उत्सव के नाम पर उस स्थल की मूल पहचान ही दबने लगे। भक्ति में संगीत है, लेकिन हर संगीत डीजे नहीं है। उत्सव में आनंद है, लेकिन हर आनंद शोर नहीं है। संस्कृति में रंग हैं, लेकिन हर रंग दिखावा नहीं है। हमारी जिम्मेदारी यह तय करने की है कि धार्मिक स्थलों पर आने वाली अगली पीढ़ी को वहां क्या अनुभव मिले-तेज संगीत और कुछ घंटों का मनोरंजन या शांति, आस्था, परंपरा और अपनी संस्कृति से जुडऩे का अवसर है।

धार्मिक स्थल की गरिमा किसी एक दिन के आयोजन से नहीं बनती, बल्कि सदियों की परंपरा से बनती है।
इसलिए उत्सव जरूर हों, संस्कृति जरूर बचे, कलाकारों को मंच जरूर मिले-लेकिन मंदिरों की शांति और आस्था की कीमत पर नहीं।