खून के थक्कों का खतरा, एंटीबॉडी की चुनौती… 28 वर्षीय महिला का जटिल किडनी प्रत्यारोपण सफल

  • पति ने दान की किडनी, प्रत्यारोपण से पहले तीन बार प्लाज्माफेरेसिस और आईवीआईजी से की गई विशेष तैयारी
  • एंटीफॉस्फोलिपिड एंटीबॉडी सिंड्रोम से पीडि़त महिला में थक्के बनने के खतरे को हेपरिन से किया नियंत्रित
  • प्रत्यारोपण के बाद किडनी ने बेहतर काम किया, सीरम क्रिएटिनिन 0.9 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर

उदय भूमि संवाददाता
गाजियाबाद/दिल्ली-एनसीआर। यशोदा मेडिसिटी के चिकित्सकों ने एंटीफॉस्फोलिपिड एंटीबॉडी सिंड्रोम से पीडि़त 28 वर्षीय महिला का हाई रिस्क किडनी प्रत्यारोपण सफलतापूर्वक कर नई उम्मीद जगाई है। मरीज में एक तरफ रक्त के थक्के बनने का गंभीर खतरा था तो दूसरी ओर पहले हुए संवेदीकरण के कारण दाता-विशिष्ट एंटीबॉडी की चुनौती भी मौजूद थी। ऐसे जटिल मामले में चिकित्सकों की बहुविषयक टीम ने प्रत्यारोपण से पहले विशेष तैयारी और प्रत्यारोपण के दौरान बेहद सावधानी बरतते हुए प्रक्रिया को सफल बनाया। महिला के पति ने उन्हें रक्त समूह के अनुरूप अपनी किडनी दान की। मरीज श्रीमती मोरीफत राशिद को करीब डेढ़ वर्ष पहले प्रणालीगत ल्यूपस एरिथेमेटोसस के कारण एंटीफॉस्फोलिपिड एंटीबॉडी सिंड्रोम होने का पता चला था। इसके बाद वह लंबे समय से गुर्दे की बीमारी से जूझ रही थीं।

रक्त में थक्के बनने की अधिक संभावना के कारण उन्हें वारफेरिन दवा दी जा रही थी। इसके अलावा तीन बार गर्भपात और कई बार रक्त चढ़ाए जाने का इतिहास होने के कारण शरीर में दाता-विशिष्ट एंटीबॉडी बनने का जोखिम भी बढ़ गया था। इन सभी परिस्थितियों ने प्रत्यारोपण को सामान्य मामलों की तुलना में काफी चुनौतीपूर्ण बना दिया।
मरीज के उपचार के लिए यशोदा मेडिसिटी की बहुविषयक टीम ने पहले ही दोनों प्रमुख जोखिमों को ध्यान में रखते हुए विस्तृत उपचार योजना तैयार की। दाता-विशिष्ट एंटीबॉडी के खतरे को कम करने के लिए प्रत्यारोपण से पहले प्लाज्माफेरेसिस के तीन सत्र किए गए।

इसके साथ ही आईवीआईजी उपचार भी दिया गया। इस प्रक्रिया का उद्देश्य शरीर में मौजूद हानिकारक एंटीबॉडी के प्रभाव को कम करना और प्रत्यारोपित किडनी के प्रति प्रतिरक्षा संबंधी जटिलताओं की आशंका को नियंत्रित करना था। रक्त के थक्के बनने के खतरे को देखते हुए प्रत्यारोपण से पांच दिन पहले नियमित वारफेरिन बंद कर दी गई। इसके स्थान पर हेपरिन के माध्यम से रक्त को पतला रखने की व्यवस्था की गई। चिकित्सकों ने ऑपरेशन के दौरान और उसके बाद भी रक्त के थक्के बनने तथा प्रत्यारोपित किडनी में रक्त प्रवाह पर लगातार नजर रखी।

सर्जरी के बाद किडनी ने किया बेहतर काम
यूरोलॉजी, यूरो-ऑन्कोलॉजी, रोबोटिक्स एवं गुर्दा प्रत्यारोपण के वरिष्ठ निदेशक डॉ. वैभव सक्सेना ने बताया कि मरीज में रक्त के थक्के बनने का खतरा अधिक होने के कारण मामला तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण था। प्रत्यारोपित किडनी में पर्याप्त रक्त प्रवाह बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण था। इसके लिए सर्जरी के दौरान रक्त पतला करने वाली दवा के समय और मात्रा तथा ऑपरेशन के बाद निगरानी की सावधानीपूर्वक योजना बनाई गई। प्रत्यारोपण के बाद मरीज का पेशाब सामान्य रूप से आता रहा और प्रत्यारोपित किडनी का काम स्थिर बना रहा। नेफ्रोलॉजी एवं गुर्दा प्रत्यारोपण के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. प्रजीत मजूमदार ने बताया कि एंटीफॉस्फोलिपिड एंटीबॉडी सिंड्रोम वाले मरीज में किडनी प्रत्यारोपण के दौरान रक्त के थक्के बनने का खतरा काफी बढ़ जाता है।

इसके साथ दाता-विशिष्ट एंटीबॉडी प्रतिरक्षा संबंधी चुनौती पैदा करती हैं। इस मामले में रक्त को पतला करने की उपचार योजना, प्लाज्माफेरेसिस और आईवीआईजी को व्यवस्थित तरीके से अपनाकर दोनों जोखिमों को नियंत्रित किया गया। प्रत्यारोपण के बाद मरीज को दोबारा वारफेरिन पर लाया गया और नियमित पीटी-आईएनआर जांच के आधार पर इसकी मात्रा निर्धारित की गई। उपचार के दौरान मरीज की हालत स्थिर रही। सीरम क्रिएटिनिन 0.7 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर रहने और प्रत्यारोपित किडनी के बेहतर काम करने के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। वर्तमान में उनका सीरम क्रिएटिनिन 0.9 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर है और प्रत्यारोपित किडनी का कामकाज अच्छा बना हुआ है।

पति ने किडनी देकर बढ़ाई उम्मीद
मरीज मोरीफत राशिद ने कहा कि पिछले कुछ वर्ष उनके और परिवार के लिए बेहद कठिन रहे। इतने जोखिमों के बीच किडनी प्रत्यारोपण कराना बड़ी चुनौती थी। ऐसे समय में पति का दाता के रूप में आगे आना उनके लिए उम्मीद और हिम्मत का बड़ा सहारा बना। उन्होंने इलाज के दौरान चिकित्सकों और पूरी टीम की देखभाल, योजना और सहयोग के लिए आभार जताया। चिकित्सकों के अनुसार यह मामला दर्शाता है कि जब रक्त के थक्के बनने और शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया से जुड़े खतरे एक साथ मौजूद हों तो किडनी प्रत्यारोपण की प्रक्रिया अधिक जटिल हो जाती है। एंटीफॉस्फोलिपिड एंटीबॉडी सिंड्रोम में प्रत्यारोपित किडनी की धमनी या नस में थक्का बनने का खतरा रहता है, जबकि दाता-विशिष्ट एंटीबॉडी प्रतिरक्षा संबंधी जटिलताएं पैदा कर सकती हैं।

ऐसे मामलों में प्रत्यारोपण से पहले जोखिमों की पहचान, उचित तैयारी और ऑपरेशन के बाद लगातार निगरानी बेहद महत्वपूर्ण होती है। उपचार में यूरोलॉजी, यूरो-ऑन्कोलॉजी, रोबोटिक्स एवं गुर्दा प्रत्यारोपण के एसोसिएट निदेशक डॉ. कुलदीप अग्रवाल तथा नेफ्रोलॉजी एवं गुर्दा प्रत्यारोपण के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. इंद्रजीत जी. मोमिन समेत बहुविषयक टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही। मरीज वर्तमान में वारफेरिन आधारित रक्त पतला करने वाली चिकित्सा, तीन दवाओं वाली प्रतिरक्षा-दमन चिकित्सा और नियमित चिकित्सकीय निगरानी में हैं।

डॉ. पीएन अरोड़ा
यशोदा मेडिसिटी के चेयरमैन

जटिल और अत्यधिक जोखिम वाले किडनी प्रत्यारोपण के सफल परिणाम हमारे चिकित्सकों की विशेषज्ञता, टीम के समन्वय और अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का प्रमाण हैं। एंटीफॉस्फोलिपिड एंटीबॉडी सिंड्रोम जैसी गंभीर स्थिति में प्रत्यारोपण के दौरान खून के थक्के बनने और प्रतिरक्षा संबंधी जटिलताओं का खतरा अधिक रहता है। ऐसे मामलों में मरीज की स्थिति का सूक्ष्म आकलन करते हुए प्रत्यारोपण से पहले और बाद में विशेष सावधानी बरतना जरूरी होता है। हमारी पूरी चिकित्सा टीम ने समन्वित प्रयास के साथ इस चुनौती का सामना किया और मरीज को सफल उपचार प्रदान किया। यह सफलता उन मरीजों के लिए भी उम्मीद की किरण है, जिनमें गंभीर जटिलताओं के कारण किडनी प्रत्यारोपण को जोखिमपूर्ण माना जाता है।
-डॉ. पी.एन. अरोड़ा
चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक
यशोदा ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स।