बाजार में फिर भूचाल, 23 हजार के नीचे निफ्टी; निवेशकों के धैर्य की अग्निपरीक्षा

  • सूचकांक की हलचल से नहीं, लक्ष्य और जोखिम क्षमता देखकर तय करें निवेश की अगली चाल: रविंद्र तिवारी
  • कच्चे तेल की छलांग और वैश्विक तनाव ने बढ़ाई बेचैनी, सेंसेक्स 1000 अंक से ज्यादा लुढ़का
  • विदेशी निवेशकों की बिकवाली और कमजोर रुपये से बाजार पर दोहरा दबाव, सातवें सप्ताह भी गिरावट

उदय भूमि संवाददाता
दिल्ली। वैश्विक स्तर पर बढ़ती उथल-पुथल के बीच भारतीय शेयर बाजार में सोमवार को एक बार फिर भारी गिरावट देखने को मिली। कारोबार के दौरान सेंसेक्स 1,000 अंकों से अधिक टूट गया, जबकि निफ्टी 23,000 के महत्वपूर्ण स्तर से नीचे चला गया। बाजार में यह कमजोरी ऐसे समय आई है, जब भारतीय शेयर बाजार लगातार सातवें सप्ताह गिरावट के साथ बंद हो चुका है। ऐसे में बाजार की चाल को लेकर निवेशकों की चिंता बढऩा स्वाभाविक है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अल्पावधि की गिरावट देखकर घबराहट में निवेश संबंधी निर्णय लेने से बचना चाहिए।
मौजूदा गिरावट के पीछे वैश्विक और घरेलू स्तर के कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। सबसे प्रमुख कारण अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ा तनाव तथा कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल है। दोनों देशों के बीच बातचीत में गतिरोध के बाद ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत करीब 106 से 107 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में यदि लंबे समय तक कच्चे तेल की कीमत ऊंची बनी रहती है तो देश का आयात खर्च बढ़ सकता है। इससे महंगाई पर दबाव पडऩे के साथ कंपनियों की लागत और लाभ पर भी असर पडऩे की आशंका रहती है।

बाजार में गिरावट का दूसरा बड़ा कारण विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली है। शुक्रवार को विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों में करीब 3,694 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की। वैश्विक बाजारों में जोखिम बढऩे की स्थिति में विदेशी निवेशक उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाने वाले निवेश माध्यमों की ओर रुख कर सकते हैं। इसका असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई देता है। इसके अलावा अमेरिकी बांड पर मिलने वाला प्रतिफल और डॉलर की मजबूती भी भारतीय बाजार पर दबाव डाल रही है। अमेरिका में बांड पर अधिक प्रतिफल मिलने से विदेशी निवेशकों के लिए वहां के निश्चित आय वाले निवेश अधिक आकर्षक हो सकते हैं। इससे भारतीय शेयरों में विदेशी पूंजी का प्रवाह प्रभावित होने की आशंका रहती है। बाजार में कच्चे तेल की कीमत, अमेरिकी बांड प्रतिफल, वैश्विक तनाव और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां इस समय प्रमुख कारक बने हुए हैं।

वित्तीय सलाहकार रविंद्र तिवारी के अनुसार, बाजार की गिरावट निवेशकों के लिए भावनात्मक परीक्षा का समय जरूर है, लेकिन वित्तीय निर्णय भावनाओं के आधार पर नहीं बल्कि लक्ष्य, निवेश की समयावधि और जोखिम क्षमता को ध्यान में रखकर किए जाने चाहिए। बाजार आज गिर सकता है और कल संभल सकता है, लेकिन निवेशक का वित्तीय लक्ष्य अपनी जगह बना रहता है। उन्होंने कहा कि निवेश का उद्देश्य बाजार की हर तेजी और गिरावट को पकडऩा नहीं, बल्कि लंबी अवधि में अपने वित्तीय लक्ष्य को पूरा करने की योजना बनाना है। मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में धैर्य, अनुशासन और निवेश में उचित संतुलन पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

रुपये की कमजोरी ने बढ़ाई चिंता
महंगे कच्चे तेल और विदेशी पूंजी की निकासी के बीच रुपये पर भी दबाव बढ़ा है। सोमवार को रुपया करीब 95.95 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंच गया। रुपये की कमजोरी का सीधा असर डॉलर में होने वाले आयात पर पड़ता है। कच्चे तेल जैसे महत्वपूर्ण आयात के लिए अधिक रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं। इससे आयात लागत बढऩे के साथ महंगाई और कंपनियों के खर्च पर भी अतिरिक्त दबाव आने की आशंका रहती है। हालांकि, शेयर बाजार की गिरावट को सीधे देश की अर्थव्यवस्था की कमजोरी मानना उचित नहीं होगा।

शेयर बाजार अल्पावधि में वैश्विक घटनाक्रम, निवेशकों की धारणा, पूंजी के प्रवाह और अंतरराष्ट्रीय संकेतों से तेजी से प्रभावित होता है। वहीं अर्थव्यवस्था का आकलन आर्थिक वृद्धि, खपत, निवेश, रोजगार और महंगाई जैसे व्यापक आर्थिक संकेतकों के आधार पर किया जाता है। इसलिए कुछ सप्ताह की बाजार गिरावट को देखकर देश की दीर्घकालीन आर्थिक स्थिति पर तत्काल निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। दूसरी ओर, लंबे समय तक महंगा कच्चा तेल और वैश्विक तनाव भारत के लिए वास्तविक आर्थिक जोखिम जरूर हैं।

लक्ष्य के हिसाब से तय करें निवेश की दिशा
करीब तीन वर्ष पहले निवेश करने वाले और अगले दो वर्ष या उससे अधिक समय बाद अपने वित्तीय लक्ष्य को पूरा करने वाले निवेशकों के लिए मौजूदा गिरावट को देखकर जल्दबाजी में निर्णय लेना उचित नहीं होगा। शेयर बाजार में तीन वर्ष की अवधि के बाद भी उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। इसलिए निवेश का आकलन केवल मौजूदा मूल्य या सूचकांक के स्तर से नहीं, बल्कि निवेश के उद्देश्य, समयावधि और जोखिम उठाने की क्षमता के आधार पर किया जाना चाहिए। वहीं जिन निवेशकों को अगले एक-दो वर्षों में निश्चित रूप से धन की आवश्यकता है, उन्हें अपने निवेश में शेयरों की हिस्सेदारी और संपत्ति के संतुलन की समीक्षा करनी चाहिए।

हर निवेशक के लिए एक जैसी रणनीति उपयुक्त नहीं हो सकती। बाजार में गिरावट के कारण नियमित निवेश योजना को अचानक बंद कर देना भी उचित नहीं माना जाना चाहिए। नियमित निवेश करने वालों को अपनी आय, वित्तीय लक्ष्य और जोखिम क्षमता को ध्यान में रखते हुए अनुशासन बनाए रखने पर विचार करना चाहिए। अतिरिक्त राशि निवेश करने से पहले व्यक्तिगत निवेश पोर्टफोलियो और जोखिम क्षमता की समीक्षा करना भी जरूरी है।