लेखक : तरुण मिश्र
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। देश-विदेश में आयोजित होने वाले व्याख्यानों में एक प्रखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। जनसेवक के रुप में प्रख्यात है।)
फ्लाई दुबई विमान की घटना ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। भारतीय पायलट स्मित मच्छार ने जिस साहस और सूझबूझ का परिचय देते हुए संभावित बड़े हादसे को टालने में भूमिका निभाई, वह पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने कर्तव्य से पीछे हटने के बजाय यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। एक ओर स्मित की बहादुरी के चर्चे भारत से लेकर इजरायल के साथ-साथ पूरे विश्व में हो रहा हैं, इजरायल ने अपना सर्वोच्च सम्मान पायलट स्मित को देने की घोषण की है। वहीं दूसरी ओर भारतीय राजनीति के कुछ चेहरे इस मामले पर असहज करने वाली खामोशी साधे हुए हैं। सबसे बड़ा सवाल कांग्रेस नेता राहुल गांधी को लेकर उठ रहा है। देश के लगभग हर राजनीतिक और विवादित मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देने वाले राहुल गांधी की ओर से स्मित मच्छार की बहादुरी पर अब तक कोई प्रमुख बयान सामने नहीं आया है। राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि जब एक भारतीय नागरिक विदेश की धरती पर अपनी जान जोखिम में डालकर सैकड़ों यात्रियों की सुरक्षा के लिए डटा रहा, तब देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी और उसके शीर्ष नेता की आवाज क्यों नहीं सुनाई दी?
राजनीति में विरोध और समर्थन अपनी जगह है, लेकिन जब मामला किसी भारतीय की बहादुरी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हो तो राजनीतिक चश्मा उतार देना चाहिए। विडंबना यह है कि जिन मुद्दों पर कांग्रेस और राहुल गांधी को बयान देने में देर नहीं लगती, वहां स्मित जैसे भारतीय की बहादुरी पर खामोशी दिखाई दे रही है। सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्मित ने केवल अपनी ड्यूटी नहीं निभाई, बल्कि ऐसी परिस्थिति में साहस दिखाया, जिसमें जरा सी चूक सैकड़ों लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ सकती थी। फ्लाई दुबई विमान से जुड़ी घटना की जांच सुरक्षा एजेंसियां कर रही हैं। ओमानी सह-पायलट की भूमिका और उसकी मंशा को लेकर गंभीर सवाल सामने आए हैं। यदि जांच में किसी सुनियोजित साजिश की पुष्टि होती है तो यह पूरी दुनिया की विमानन सुरक्षा के लिए बड़ी चेतावनी होगी। आतंकवाद और कट्टरपंथी सोच रखने वाले लोग यदि विमान के चालक दल तक पहुंच बनाने में सफल होते हैं तो खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

यही कारण है कि स्मित मच्छार की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। खून से लथपथ होने के बावजूद उन्होंने जिस धैर्य का परिचय दिया, वह बताता है कि संकट की घड़ी में एक व्यक्ति का साहस कितनी बड़ी त्रासदी को टाल सकता है। 11 सितंबर 2001 को अमेरिका में हुए आतंकी हमले ने दुनिया को विमान हाईजैकिंग के भयावह परिणाम दिखाए थे। चार विमानों के अपहरण और उनके इस्तेमाल से हुई उस त्रासदी में करीब तीन हजार लोगों की जान गई थी। फ्लाई दुबई की घटना ने उसी पुराने खतरे की याद फिर ताजा कर दी है।
भारत भी विमान हाईजैकिंग की भयावहता झेल चुका है। 1999 का कंधार विमान कांड आज भी भारतीयों की स्मृति में ताजा है। आतंकियों ने विमान को हाईजैक कर कंधार पहुंचाया और दबाव बनाकर जेल में बंद आतंकियों को छुड़ाने में सफलता हासिल की थी। ऐसे में विमानन सुरक्षा से जुड़ी किसी भी घटना को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आज आतंकवाद का चेहरा और तरीका बदल चुका है। खतरा केवल बाहर से आने वाले हमलावरों तक सीमित नहीं है। यदि चालक दल का कोई सदस्य ही अतिवादी विचारधारा से प्रभावित होकर विमान को निशाना बनाने की कोशिश करे तो सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई चुनौती खड़ी हो जाती है। इसलिए पायलट और सह-पायलट की पृष्ठभूमि के साथ उनके व्यवहार, गतिविधियों और संभावित अतिवादी संपर्कों की निगरानी को लेकर सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत करनी होगी।
इस पूरी घटना ने भारत और इजरायल के संबंधों को लेकर भी एक नया भावनात्मक पक्ष सामने रखा है। स्मित की बहादुरी की चर्चा इजरायल में भी हो रही है। दोनों देशों के बीच पहले से मजबूत संबंधों के बीच एक भारतीय पायलट का साहस वहां के लोगों के बीच भारत के प्रति भरोसे और सम्मान को और मजबूत कर सकता है।
लेकिन राजनीति के लिए भी यह घटना आत्ममंथन का अवसर है। देश के हर मुद्दे में अपनी टांग अड़ाने और छोटी राजनीति करने वाले नेताओं से जनता यह सवाल पूछने लगी है कि राष्ट्रीय हित के विषयों पर उनकी प्राथमिकता क्या है? अभिजीत दीपके जैसे राजनीतिक व्यंग्य से जुड़े विवादों पर राजनीतिक बहस तेज करने वालों को यह भी बताना चाहिए कि एक भारतीय पायलट की असाधारण बहादुरी पर उनकी आवाज क्यों कमजोर पड़ गई?
कांग्रेस पर आलोचना करने वाले यह भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या पार्टी हर मुद्दे को राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू में तौलती है? यदि ऐसा नहीं है तो राहुल गांधी को सामने आकर स्मित मच्छार की बहादुरी की सराहना करनी चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा और देश के नागरिकों के साहस को दलगत राजनीति से ऊपर रखना ही जिम्मेदार विपक्ष की पहचान होनी चाहिए।
स्मित मच्छार की बहादुरी को किसी पार्टी की उपलब्धि नहीं बनाया जा सकता। यह पूरे भारत की उपलब्धि है। इसलिए राजनीतिक दलों की चुप्पी से ज्यादा जरूरी यह है कि देश ऐसे साहसी नागरिकों के साथ खड़ा हो। आतंकवाद और अतिवाद के खिलाफ लड़ाई केवल सरकार या सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी नहीं है। समाज और राजनीतिक नेतृत्व को भी स्पष्ट संदेश देना होगा कि देश की सुरक्षा के सवाल पर कोई समझौता नहीं होगा।
फ्लाई दुबई की घटना ने चेतावनी दे दी है। अब सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करना होगा और किसी भी संभावित खतरे को हल्के में नहीं लेना होगा। स्मित मच्छार ने अपना कर्तव्य निभाकर इतिहास में एक मिसाल कायम की है। अब बारी उन राजनीतिक दलों की है जो हर समय देश और राष्ट्रीय हित की बात करने का दावा करते हैं। जनता देख रही है कि संकट की घड़ी में कौन बोलता है और कौन खामोश रहता है।

















